बंग भंग (बंगाल विभाजन ) -1905

बंग भंग (बंगाल विभाजन ) -1905

बंग भंग (बंगाल विभाजन)-  

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बंगाल विभाजन ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन किया। अंग्रेजो ने भारत की विविधता को देख यहां फूट डालो राज करो की नीति अपनायी  थी, और सम्पूर्ण भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित कर  लिया। ब्रिटिश राज में बंगाल एक बहुत बड़ा प्रांत था, जिसमे छोटी छोटी मात्रा में विद्रोह देखने को मिलता था, बंगाल प्रान्त की जनसंख्या अनुमानतः 7 करोड़ 85 लाख  थी जो कि उस समय फ्रांस तथा ब्रिटेन की जनसंख्या के योग के बराबर थी।

बंगाल के विभाजन की नीति 1903 से बनाई जा रही थी, जिसकी घोषणा 20 जुलाई 1905  को तथा बंगाल का विभाजन 16  अक्टूबर 1905 को लार्ड कर्जन के नेतृत्व में  कर दिया गया। बंगाल विभाजन से पूर्व बंगाल में बिहार, ओडिशा, झारखंड , पश्चिम बंगाल, आसाम, तथा पूर्वी भारत के अन्य राज्य आते थे।

बंगाल को दो भागों  में बांटा  गया पूर्वी बंगाल तथा पश्चिम बंगाल, बाँटने का मुख्य उद्देश्य फूट  डालना था, इसलिए बंगाल को धर्म के आधार पर बांटा  गया पूर्वी बंगाल मुसलमानों तथा पश्चिम बंगाल हिन्दुओ के नाम किया गया। तथा बंगाल विभाजन के लिए यह तर्क दिया गया कि  यह एक बड़ा प्रान्त है जिस कारण प्रसासन को सुगम बनाने के लिये इसको बांटा  गया है।   बांग्ल भाषी मुस्लिमो के नेता नवाब सलीमुल्लाह ने इसका समर्थन भी किया लेकिन बंगाल के हिन्दू इसका भरजोर विरोध करने लगे।

इसके विरोध में मुंबई, पुणे तथा दिल्ली में  भी रैलियां निकाली  गयी, इसके विरोध में लाला लाजपत राय, बाल  गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पॉल और अरविंदो घोष एक मंच परआ गए।  जिससे की आक्रोश ने नया रूप धारण कर लिया तथा स्वदेशी आंदोलन ने रफ़्तार पकडी। विदेशी वस्तुओ का विरोध किया जाने लगा यहां  तक कि यूरोपियन  नमक तक का बहिस्कार किया जाने लगा तथा स्वदेशी वस्तुओ की मांग बढ़ने लगी।  और इस आंदोलन में कांग्रेस को भारी  समर्थन मिलने लगा।

बंग-भंग  नीति पूर्ण रूप से असफल रही एवं विभिन्न आंदोलनों के पश्चात 1911 में बंगाल को पुनः एक किया गया।
E-gyankosh

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