भारत-चीन युद्ध 1962 - Bharat China Yuddha 1962

भारत-चीन युद्ध 1962 - Bharat China Yuddha 1962

भारत-चीन युद्ध (1962)

China vs india

भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् भारत-चीन संबंध 

भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत और चीन के संबंध काफी अच्छे थे। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय चीन में गृह युद्ध छिड़ा हुआ था। पूरा चीन दो हिस्सों में बंटा हुआ था, पहला कम्युनिस्ट और दूसरा नेशनलिस्ट। कम्युनिस्ट पार्टी ने गृह युद्ध जीत लिया तथा पीपल रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की स्थापना की। नेशनलिस्ट चीन की मुख्य भूमि से पलायन कर गए तथा ताइवान (रिपब्लिक ऑफ़ चाइना) की स्थापना की। अमेरिका , इंग्लैंड तथा पश्चिमी देश चीन की कम्युनिस्ट नीतियों के कारण चीन के विरुद्ध थे तथा चीन के यूनाइटेड नेशन में प्रवेश को प्रतिबंधित कर रहे थे, परन्तु चीन को भारत का पूर्ण समर्थन था तथा भारत ने चीन को यूनाइटेड नेशन में शामिल होने में समर्थन भी किया। 1960 में भारत के वीटो पॉवर लेने से मना करने पर ही यह चीन के पास गयी। 

युद्ध से पूर्व की स्थिति 

सन 1954 में भारत तथा चीन के बीच पंचशील समझौता हुआ, जिसमे शांति के 5 मूलभूत सिद्धांतो को शामिल किया गया। 
  1. एक दुसरे की अखंडता तथा सम्प्रभुता का सम्मान करना। 
  2. आक्रमण ना करने की आपसी सहमति। 
  3. एक दुसरे के आंतरिक मामलो में हस्तक्षेप ना  करना। 
  4. समानता तथा आपसी लाभ। 
  5. शांति सह अस्तित्व।
भारत तथा चीन के बीच सीमाओं का विवाद पुराना है जिसका मुख्य कारण हिमालयो की ऊंचाइयों में सीमाओं का होना है, यहां पहुंचना दुर्लभ था इस कारण  पुराने राज्यों में सीमाओं को बस अनुमान से तय किया जाता था। ब्रिटिश समय में भारत के पूर्वी क्षेत्र अरुणाचल से मिलती चीन की सीमाओं को मैकमोहन रेखा द्वारा तय किया गया था। लेकिन चीन अरुणाचल को दक्षिण तिब्बत के नाम से बुलाता है।  और दूसरा विवादित क्षेत्र अक्साई चिन है जिसपर वर्तमान में चीन का अधिकार है। 1956 में चीन ने अक्साई चिन से होती हुए एक सड़क का भी निर्माण कर लिया जिसका पता भारत को 2 साल बाद सन  1959 में चला।
1959 में तिब्बत में कम्युनिस्ट के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया जिसको चीन की सेना ने कुचल दिया, परन्तु दलाई लामा तिब्बत से पलायन कर गए, जिनको भारत में शरण मिली जो चीन को नागवार गुजरा। सन 1960 में ज़ोउ एनलाई भारत आये तथा स्थिति को यथावत बनाये रहने का प्रस्ताव रखा, जिसमे उनके द्वारा यह प्रस्ताव रखा कि अक्साई चिन पर चीन का अधिकार रहेगा तथा दोनों सेनाएं मैकमोहन रेखा से 20 किमी दूर रहेंगी।  परन्तु भारत ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया। 
1961 में नेहरू ने फॉरवर्ड पॉलिसी अपनायी तथा चीन की सीमाओं में अपनी सेनाओ की स्थैतिक पोस्ट बना ली। तथा चीन ने यह तर्क दिया कि  भारत तिब्बत पर या तो आक्रमण करने वाला है या फिर उसको अपने अधिकार में लेने की योजना बना रहा है, और 20 अक्टूबर को चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया तथा मात्र 4 दिन के अंदर ही चीन भारत के अंदर तेजपुर(आसाम) तक पहुँच गया। वही दूसरी ओर  रेजांग ला (लद्दाक) में भारत के मात्र 123 सैनिको (13 कुमाऊं ) जिनका नेतृत्व मेजर सैतान सिंह (पीवीसी) कर रहे थे ने चीन के 1000 सैनिको को मौत के घाट उतार दिया यह 17000 फीट पर लड़ी गयी लड़ाई थी। भारत चीन युद्ध 4 हफ्तों तक चला अंत में चीन ने युद्ध विराम की घोषणा की  और अपनी सेना को मैकमोहन रेखा से पीछे ले लिया तथा अक्साई चिन पर कब्ज़ा कर लिया। 

चीन के द्वारा युद्ध विराम की घोषणा के कारण

माना  जाता है कि चीन ने युद्ध विराम की घोषणा निम्न कारणों से की 
  1. चीन ने वह प्राप्त कर लिया जो वह चाहता था (अक्साई चिन)।
  2. एशिया में अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर दिया।  
  3. भारत को यूएसए, यूके तथा यूएससआर का समर्थन मिल गया था। 
  4. चीन को डर था कि कही यूएसए युद्ध में न कूद जाए। 

भारत में युद्ध का प्रभाव 

  1. जवाहर लाल नेहरू ने विश्व में अपनी प्रतिष्ठा खो दी पहले उनको एक सफल राजनयिक माना जाता था। 
  2. भारत ने अपनी आर्मी को मजबूत तथा हथियारों को आधुनिक किया। 
  3. भारत ने यह भी सीखा कि उसका एकमात्र दुश्मन सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं है। 
इस युद्ध के पश्चात पाकिस्तान तथा चीन के रिश्तो में सुधार हुआ तथा पाकिस्तान ने ट्रांस काराकोरम पथ चीन को दे दिया तथा कश्मीर मुद्दे में चीन को भी शामिल कर दिया।
J&K map
पीला भाग चीन के कब्जे में है। 

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