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आज़ाद हिन्द फौज (इंडियन नेशनल आर्मी )

आज़ाद हिन्द फौज (इंडियन नेशनल आर्मी )

आजाद हिन्द फौज अथवा इंडियन नेशनल आर्मी-

आज़ाद हिन्द फौज जिसे इंडियन नेशनल आर्मी  के नाम से भी जाना जाता है, का गठन 1942 में मोहन सिंह 
द्वारा किया गया था और इसका पुनर्गठन  नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा किया गया। इसका गठन इसलिए किया गया ताकि अंग्रेजो के खिलाफ जंग छेड़ी जाए और उन्हें भारत से बाहर निकाला जा सके। इसका भारत की आजादी में एक अहम योगदान रहा है।

Aazad Hind Fouj
आजाद हिन्द फौज 


नेताजी सुभाष चंद्र बोस-

सुभाष चंद्र बोस उन महानायकों में में से एक हैं जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वश्व न्यौछावर  कर दिया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1987 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता चाहते थे कि वे आई.सी.एस (प्रशासनिक अधिकारी) बने। उन्होंने 1920 की  आई.सी.एस परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया तथा अपने पिता का सपना पूरा किया, परन्तु उनको अंग्रेज़ों के अधीन काम करना बिलकुल भी पसंद नहीं था, इसलिए 22 अप्रैल 1921  उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। 1920 और 1930 के दशक के अंत में यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के युवा, कट्टरपंथी विंग के नेता बन गए। उनके देश सेवा के संघर्ष के कारण ही महत्मा गाँधी ने उन्हें देशभक्तों का देशभक्त कहा है। उन्हें नेताजी की उपाधि रविंद्र  नाथ टैगोर ने  दी थी। बाद में यह आजाद हिन्द फौज में जा मिले। 

Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी की प्रतिमा 

आज़ाद हिन्द फौज का गठन-

 द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापान और ब्रिटेन आमने सामने थे, 1939 में भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड लिनलिथगो ने भारत की सेना के 70000 से अधिक जवानों को ब्रिटेन की दक्षिण-पूर्व एशिया की  कॉलोनियों (सिंगापुर, फ़िलीपीन्स, मलया,हांग-कांग आदि ) में भेज दिया, क्योंकि इन जगहों पर जापानी सेना के आक्रमण का खतरा ज्यादा था। 3 सितम्बर 1939 में वाइसराय  लिनलिथगो ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय भी लड़ेंगे, यह बयान उन्होंने 1937 में चयनित भारतीय नेताओं से बिना पूछे जारी किया था इसके पश्चात जवाहर लाल नेहरु ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके पश्चात जापान ने ब्रिटैन की इन कॉलोनियों पर आक्रमण किया  तथा भारत के सैनिकों को युद्ध बंदी बना दिया। 1942 में राश विहारी बोस ने जापानी गवर्नमेंट, मोहन सिंह तथा निरंजन सिंह गिल की सहायता से उन्ही युद्ध बंदियों को लेकर एक सेना  का गठन किया तथा इसको नाम दिया गया आज़ाद हिन्द फौज । मलया से युद्ध बंदी बनाये गए  कैप्टन मोहन सिंह को इसकी जिम्मेदारी दे दी गयी, परन्तु उनकी जापानी सरकार के साथ अनबन के चलते आज़ाद हिन्द फौज का ये गठन सफल नहीं हो पाया। 1943 में जब सुभाष चंद्र बोस ने जब जर्मनी से निराश होकर जापान का रुख किया तो वहां राश विहारी बोस से मुलाक़ात हुई और इंडियन नेशनल आर्मी को पुनर्स्थापित करने की बात हुई तथा इस बार इंडियन नेशनल आर्मी का गठन नेताजी की रेख देख में 21 अक्टूबर 1943 में जापान में हुआ। 



 आज़ाद हिन्द फ़ौज की सेना -

नेताजी की आज़ाद हिन्द फौज में 85000 से अधिक सैनिक शामिल थे। प्रारम्भ में इसमें केवल जापान द्वारा बंदी बनाये हुए सैनिक ही थे परन्तु बाद में बर्मा (अब म्यांमार) तथा मलया से स्वयं सेवक तथा भारत मूल के लोग जो देश से बाहर रह रहे थे वो भी भी इसमें शामिल  हो गए। आज़ाद हिन्द फौज में पहली बार एक पूर्ण महिला रेजिमेंट की भी स्थापना की गयी थी, जिसका नाम रानी ऑफ़ झाँसी रेजिमेंट रखा गया तथा इसका नेतृत्व लक्ष्मी स्वामीनाथन ने किया। इसके आलावा इस आर्मी में ब्रिटिश आर्मी की तरह कोई ऊंच-नीच, काले-गोर का कोई भेदभाव नहीं था। 
नेताजी ने इसमें चार ब्रिगेड बनाये थे- जिसमे शामिल थे गाँधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड, आजाद ब्रिगेड, सुभाष ब्रिगेड।


आज़ाद हिन्द सरकार का गठन- 

21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिन्द फौज के प्रमुख की हैसियत से सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की 
अस्थायी आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की। अपनी इस  सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा  सेना अध्यक्ष तीनो पदों को नेताजी ने अकेले संभाला।   इसके साथ ही अन्य जिम्मेदारियां जैसे वित्त विभाग एस.सी चटर्जी को, प्रचार विभाग एस.अय्यर को दिया गया। उनकी इस  सरकार को जर्मनी,जापान, फ़िलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, बर्मा (अब म्यांमार), और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। 1943 में ही जब जापान  अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह को जीता  तथा उसे आज़ाद हिन्द सरकार को दे दिया। इसके  पश्चात  नेताजी ने अंडमान का नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का नाम स्वराज द्वीप रख दिय, तथा सिंगापुर एवं रंगून में आज़ाद हिन्द फौज का मुख्यालय बनाया। 30 दिसंबर 1943  को द्वीपों पर स्वतंत्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया। 


आजाद हिन्द फौज की लड़ाइयां और पतन-

4 फरवरी 1944 को आज़ाद हिन्द फौज ने अंग्रेज़ों पर कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों पर आक्रमण किया तथा  विजय हुए। ये उनकी (आज़ाद हिन्द फौज ) भारतीय धरती पर प्रथम विजय थी। इंडियन नेशनल  आर्मी ने मणिपुर के मोइरांग में प्रथम बार भारत भूमि पर अपना झंडा फहराया। आज़ाद हिन्द फौज ने इसके पश्चात कुछ लड़ाईयां और जीती परन्तु समय के साथ वे कमजोर पड़ने लगे, उनके पास खाने को ना तो राशन था और ना ही  लड़ने के लिए अस्ला बचा था। ब्रिटिश सरकार ने आज़ाद हिन्द फौज के  सैन्य ठिकानों पर हवाई हमला करके उन्हें नष्ट कर दिया तथा आज़ाद हिन्द फौज के 16000 से अधिक  सैनिकों को युद्ध बंदी बना लिया गया। इसी बीच खबर आयी कि नेताजी की एक प्लेन दुर्घटना में  मृत्यु हो गयी। और इसी के साथ आज़ाद हिन्द फौज को खत्म कर दिया गया। 

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