नमक सत्याग्रह और दांडी यात्रा

नमक सत्याग्रह और दांडी यात्रा

नमक सत्याग्रह और दांडी यात्रा-

नमक सत्याग्रह का प्रारंभ दांडी यात्रा, जो कि गांधी जी के नेतृत्व में 12 मार्च 1930 में की गयी, से हुआ। सन् 1922 में चौरी चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन के समाप्त होने के पश्चात गांधी जी ने अपना ध्यान समाज सुधार के कार्यों में लगा दिया। सन् 1928 में साइमन कमीशन के भारत आने पर पूरे देश में इसका विरोध चल रहा था और इसी के साथ गांधी जी ने राजनीति में वापसी की उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से साइमन कमीशन के विरोध का सहयोग किया। दिसंबर 1929 में कांग्रेस ने अपना अधिवेशन लाहौर में किया तथा इसमें दो मह्वपूर्ण घटनाएं हुई, पहला कि एक युवा (जवाहर लाल नेहरू) को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। दूसरा पूर्ण स्वराज/पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा कर दी, जिससे भारत में राजनैतिक हलचल में तेजी आ गयी।


26 जनवरी 1930 को कांग्रेस द्वारा कई स्थानों पर झंडे फहराकर और राष्ट्रगीत गाकर स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। और इसमें गांधी जी द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि इसे किस प्रकार मनाया जाए। जिसमे संगोष्ठियों को एक साथ करने, ध्वज फहराकर और भाषणों से इसको मनाने की बात कही थी। यह भारत में मनाया गया पहला स्वतंत्रता दिवस था जो बिना आजादी मिले ही मनाया गया था, इसका मुख्य उद्देश्य अंग्रेजो की नींव को कमजोर करना और लोगो में स्वतंत्रता का भाव जगाना था। जिसमे कांग्रेस बहुत हद तक कामयाब भी हुई थी, लगभग देश के हर एक कोने में स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाया गया।

दांडी यात्रा की शुरवात क्यों हुई?

स्वतंत्रता दिवस मनाए जाने के तुरंत बाद महात्मा गांधी जी ने यह घोषणा की थी कि वह नमक कर के कानून के विरूद्ध एक यात्रा का नेतृत्व करेंगे। 
   "ब्रिटिश सरकार द्वारा 1882 में नमक अधिनिय पारित किया था, जिसके अनुसार ब्रिटिश सरकार का नमक के निर्माण और उसकी बिक्री पर एकाधिकार हो गया। नमक का निर्माण कर उन्हें केवल सरकारी नमक के गोदामों में प्रति 82 पाउंड पर एक रुपए और चार आने का कर चुका कर दिया जाता था, कोई भी व्यक्ति यदि नमक बनाता व बेचता पाया जाता तो उसे कम से कम छह माह के करावास की सजा दी जाती थी।"
इसी कानून के खिलाफ महात्मा गांधी जी ने 12 मार्च 1930 में लगभग 80 सत्याग्रहियों के साथ साबरमती आश्रम से एक यात्रा निकली जो कि 240 मील लंबी थी और 3 हफ्ते चली और दांडी जो कि सूरत के नजदीक एक समुद्रीय तट है पहुंच कर गांधी जी द्वारा एक मुट्ठी नमक बनाकर 06 अप्रैल 1930 को खत्म हुई, जिसे दांडी यात्रा अथवा नमक यात्रा के नाम से जाना जाता है। जब गांधी द्वारा इसकी चर्चा कांग्रेस में कहीं तो कई सहयोगी नेताओं ने उनका यह कहकर विरोध किया था कि "बड़ी बड़ी समस्याएं है और आप एक छोटी सी समस्या के लिए यात्रा निकालेंगे, लोग इस यात्रा का हिस्सा कैसे बनेंगे जिसका आधार ही नाम मात्र हो"।

Dandi march
दांडी यात्रा

परन्तु गांधी जी के इस निर्णय का वृहद मात्रा में स्वागत किया गया और उनके समानांतर कई यात्राएं भी निकली गयी। लोगो ने इसका समर्थन इसलिए भी किया क्योंकि नमक रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाली चीज है, और इसे खरीदने के लिए बहुत अधिक धनराशि देनी पड़ती है और उसपर अत्यधिक कर लगा हुआ है जबकि उसे घर में भी बनाया जा सकता था परन्तु घर में बनाने पर पूर्णतः पाबंदी थी अंग्रेज़ सरकार ने मनमाना कानून बना कर लोगो को प्रताड़ित किया था।
Gandhi Ji
नमक इकठ्ठा कर नमक कानून को 
तोड़ते महात्मा गाँधी जी 


नमक सत्याग्रह की शुरवात-

अधिकांश लोगों को इस यात्रा का प्रभाव समझ आ गया था, परन्तु अंग्रेज़ इसे नहीं समझ पाए थे। हालांकि गांधी जी द्वारा इस यात्रा की सूचना लॉर्ड इरविन को पहले से दी गयी थी।  और इस प्रकार नमक सत्याग्रह की शुरवात हुई। देश भर में औपनिवेशिक दमनकारी नीतियों का उलंघन किया गया, जिनमें से एक औपनिवेशिक वन कानून का उलंघन था, जिसके तहत मवेशी उन जंगलों में नहीं जा सकते थे जिनमें कभी वह स्वतंत्रता पूर्वक भोजन के लिए आ-जा सकते थे। कुछ कस्बों में फैक्ट्री के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। गांधी जी ने कई भाषण दिए जिसमे उन्होंने सरकारी कर्मचारियों को नौकरी छोड़ कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की अपील की जिससे कई लोग सरकारी नौकरियां छोड़ कर सत्याग्रह में भाग लेने लगे। 

नमक सत्याग्रह के परिणाम-

नमक सत्याग्रह के दौरान कई लोगो को गिरफ्तार किया गया जिनमें गांधी जी तथा जवाहर लाल नेहरू भी थे।गांधी जी को पहले तो गिरफ्तार नहीं किया गया परन्तु बाद में धरसना नमक सत्याग्रह से एक दिन पहले गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसके बाद इस सत्याग्रह में काफी उछाल आया हजारों लोग इस सत्याग्रह में कूद पड़े साथ ही इसकी जानकारी रूस और अमेरिकी प्रेस में भी छापी जा रही थी जिसके कारण गांधी जी को व्यापक कवरेज मिला और दुनिया उनको जानने लगी। इस जनांदोलन में महिलाओं ने भी बड़ चड़कर हिस्सा लिया और समाजवादी कार्यकर्ता कमलादेवी चटोपाध्याय ने नमक कानून का उलंघन कर सामूहिक गिरफ्तारी दी थी, यह भी माना जाता है कि गांधी जी को महिलाओं के समर्थन का सुझाव इन्होंने ही दिया था। इन सब घटनाओं के बाद अंग्रेज़ सरकार को यह तो मालूम पड़ गया था कि अब उनका राज ज्यादा दिन नहीं टिक पाएगा उन्हें अब सत्ता कभी ना कभी भारतीयों को देनी पड़ेगी। ब्रिटेन में भी इस विषय पर अनेक चर्चाएं हुयी लॉर्ड इरविन पर दबाव बना और उन्होंने जनवरी 1931 में गांधी जी को रिहा कर दिया। जिसके पश्चात गांधी इरविन समझौता हुआ तथा कांग्रेस की बढ़ती राजनैतिक गतिविधियों के कारण सितंबर से दिसंबर 1931 में हुए द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस को भी सामिल किया गया।

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