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हड़प नीति अथवा व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse)

हड़प नीति अथवा व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse)

लार्ड डलहौज़ी की हड़प नीति-

1848 में लॉर्ड डलहौजी द्वारा एक नीति अपनाई गई, जिसके अनुसार यदि किसी भी भारतीय राजा के पास अपना कोई जायज उत्तराधिकारी ना हो तो उसकी सारी संपत्ति को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन कर दिया जाएगा और इस नीति हो हड़प नीति अथवा व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse) के नाम से जाना जाता है। यह परमसत्ता के
सिद्धांत का एक उप सिद्धांत था, जिसके अन्तर्गत ब्रिटेन द्वारा भारतीय राजाओं और उनके अधीनस्थ राज्यो के उत्तराधिकार और व्यवस्थापन का दावा किया अथवा हड़प लिया।

Lord Dalhousie
लार्ड डलहौज़ी


हड़प नीति क्या थी?

लॉर्ड हार्डिंग के बाद सन् 1848 में लॉर्ड डलहौजी भारत आया तथा कई नीतियां बनाई और कई नीतियों में सुधार किया और इसी में एक थी हड़प नीति, यह एक विस्तारवादी नीति थी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने कई ऐसी नीतियां बनाई थी जिसके द्वारा भारत के राज्यो को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीनस्थ किया जा सके। उनमें से एक थी हड़प नीति जिसके अन्तर्गत किसी भी निसंतान राजा के राज्य को ब्रिटिश सरकार द्वारा चलाया जाएगा । इस प्रकार की कई विस्तारवादी नीति अपनाई गई जैसे -
  • किसी राज्य पर आक्रमण कर राज्य पर आधिपत्य करके।
  • राज्य पर निरंकुश शासन का आरोप लगा कर उसे अपने अधीन करके।
  • किसी भी राज्य जो कि कर्ज में है, उसपर अपना आधिपत्य जमा कर।

हड़प नीति का असर-

हिंदु धर्म के अनुसार यदि किसी राजा का कोई पुत्र अथवा उत्तराधिकारी नहीं है, तो उसके द्वारा गोद लिए गए पुत्र को ही उसका उत्तराधिकारी माना जाता था और सारा राजकाज उसे ही सौंप दिया जाता था। परन्तु इस विस्तारवादी नीति (हड़प नीति) के अन्तर्गत निसंतान राजा के राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन कर दिया जाता और दत्तक पुत्र को राजा की निजी सम्पत्ति देकर उसे तनख्वाह दी जाती थी। इसमें प्रारंभ में कुछ उपाधियों और पेंशन की व्यवस्था की गई थी, परन्तु बाद में उनमें भी प्रतिबंध लगाया जाने लगा।

हड़प नीति से प्रभावित राज्य-

इस नीति के तहत स्वाभाविक अथवा दत्तक पुत्र के ना होने पर निम्न राज्यो का विलय किया गया-
  • सातारा (1848)
  • जैतपुर संबलपुर (1849)
  • बघात  (1850)
  • उदयपुर (1852)
  • झांसी (1853)
  • नागपुर (1854)
  • करौली (1855)
  • अवध (1856)
सबसे पहले 1848 में सातारा का विलय किया गया। अप्पा साहेब सतारा के राजा थे, ने अपनी मृत्यु से कुछ वर्ष पूर्व बिना ईस्ट इंडिया कंपनी को बताए एक पुत्र गोद ले लिया और उनके मरने के पश्चात लॉर्ड डलहौजी ने इसे आश्रित राज्य का दर्जा देकर इसका अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कर दिया। ब्रिटेन की निचली संसद जिसे House of Commons के नाम से जाना जाता है, में जोसेफ ह्यूम ने इसकी संज्ञा में कहा था "जिसकी लाठी उसकी भैंस"। इसके पश्चात जैतपुर के राजा नारायण सिंह के राज्य का 1849, झांसी के राजा गंगाधर राव का राज्य 1853, एवम् नागपुर के राजा रघुजी तृतीय का राज्य 1854 में ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन कर दिया । इसी के विरोध के लिए 1857 की क्रांति में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजो से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की ।

प्रारंभ में तो पेशन और उपाधियां दी जाती थी, परन्तु 1853 में डलहौजी ने कर्नाटक के नवाब की पेंशन बंद कर दी, 1855 में तंजौर के राजा की मृत्यु के पश्चात उसकी उपाधि छीन ली, डलहौजी मुगल सम्राट की उपाधि भी छीनना चाहता था, परन्तु सफल नहीं रहा। 1853 में पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु के पश्चात उसने नाना साहेब को पेंशन देने से मना कर दिया । 1856 में अवध पर कुशासन का आरोप लगा कर उसका भी विलय कर दिया। यह पूर्ण रूप से मनमानी वाली नीति थी।



हड़प नीति के परिणाम-

इस नीति से भारतीय राजाओं में आक्रोश था, गंगाधर राव के मरने के बाद जब जबरन झांसी की रानी को महल खाली करने को बोला गया, तो उन्होंने कहा "में अपनी झांसी नहीं दूंगी"। हर राजा इसका विरोध करने लगा हर उत्तराधिकारी इससे इस अंग्रेजी मनमानी के खिलाफ लड़ने लगा। भले ही 1857 की क्रांति सैनिकों द्वारा प्रारंभ कि हो लेकिन उसे क्रांति का रूप आक्रोशित राजाओं द्वारा ही दिया गया था। इसके फलस्वरूप हुई 1857 की क्रांति के पश्चात भारत ईस्ट इंडिया से ब्रिटिश साम्राज्य के हाथो चला गया ।
 

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