चम्पारण सत्याग्रह - Champaran Satyagraha

चम्पारण सत्याग्रह - Champaran Satyagraha

चम्पारण सत्याग्रह-



चम्पारण सत्याग्रह ने भारतीय आजादी के आंदोलनो में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया, इसकी शुरवात  19 अप्रैल 1917  को महात्मा गाँधी जी के नेतृत्व में हुई। यह किसानो का एक विद्रोह था जो, बिहार के चम्पारण जिले से प्रारम्भ हुआ, इसलिए इसे चम्पारण सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजो द्वारा जबरन नील की खेती कराने से चम्पारण के किसान बहुत परेशान थे, और गांधी जी के समर्थन मिलने के पश्चात उन सबने इस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। 
champaran
पूर्वी चम्पारण 


चम्पारण सत्याग्रह की शुरवात-

चम्पारण सत्याग्रह में दो लोगो का महत्वपूर्ण योगदान रहा, एक तो महात्मा गाँधी जी और दूसरे राजकुमार शुक्ल। जुलाई 1915 को महात्मा गाँधी साउथ अफ्रीका से वापस लौटे और वह कांग्रेस से जुड़ गए। सन 1916 में गांधी जी ने  कांग्रेस के लखनऊ में हुए अधिवेशन  में भाग लिया, और उनकी मुलाकात हुई राजकुमार शुक्ल से इस मुलाकात ने गाँधी जी के जीवन की व भारतीय राजनीति में उनकी दिशा व दशा बदल दी। राजकुमार शुक्ल चम्पारण से थे, तथा वहां जबरन उगाई जाने वाली नील की खेती व उस पर लगाए गए  कर से परेशान थे।  अंग्रेज बागान मालिकों ने वहां के किसानो के साथ करार किया हुआ था, जिसे तिनकठिया पद्वति के नाम से जाना जाता है।  इसके अंतर्गत किसानो को कृषि भूमि के 3/20 भाग में नील की खेती करना अनिवार्य होता था। और बाद में विभिन्न करो व नील से कम आमदनी  के कारण किसानों को अपने खाने के लिए  बाकी कृषि भूमि पर्याप्त नहीं हो रही थी। वहां के किसानो की स्थिति अत्यधिक दयनीय थी, और इसलिए राजकुमार शुक्ल गाँधी जी से मिलने लखनऊ गए थे।  वह चाहते थे कि गाँधी जी उनके लिए आंदोलन करे तथा वहां के किसानो को इस पद्वति से मुक्ति दिलाये।  


Mhatma Gandhi
महात्मा गाँधी


राजकुमार शुक्ल के बार-बार आग्रह करने पर गांधी जी ने चम्पारण जाने का फैसला किया। 10 अप्रैल को गाँधी जी अपने कुछ साथियो के साथ पटना पहुंचे। जैसे ही वहां के कमिश्नर को पता चला तो उसने गांधी जी के चम्पारण आने  प्रतिबंध लगा दिया और उन्हें तुरंत वापस जाने को कहा।  परन्तु गाँधी जी ने इसकी अवहेलना कर 15 अप्रैल को चम्पारण की धरती पर कदम रखा तो उन्होंने देखा कि पूरा गांव उनके स्वागत के लिए आया हुआ है। गांधी जी को वहां आने के लिए प्रतिबंध लगा था तो उनको गिफ्तार कर लिया और अगली शुबह उनको  कोर्ट में हाज़िर किया गया, पूरा गांव  पहले तो जेल और फिर कोर्ट के आगे इकठ्ठा हो गया।  वहां के मजिस्ट्रेट ने यह देख उन्हें तुरंत रिहा कर दिया गया। गांधी जी ने अपनी पुरानी नीति, अहिंसा का मार्ग अपनाया जो की वह साउथ अफ्रीका में अजमा चुके थे। वहां के लोकल अखबारों में उनकी बड़ी चर्चा की गयी और सभी किसानो ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने से अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा और पिछले कई दसको से की जाने वाली नील की खेती धीरे-धीरे बंद हो गयी।इस इतिहासिक जनांदोलन में डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ अनुग्रह नारायण सिंह, आचार्य कृपलानी समेत कई लोगो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

चम्पारण सत्याग्रह के परिणाम-

गाँधी जी को यकीन नहीं था कि वह इतने कम समय में इस आंदोलन को सफलता दिला पाएंगे। चम्पारण सत्याग्रह ने लोगो को अहिंसा की शक्ति का आभास करा दिया। गांधी जी की चर्चा चारों ओर फैल गयी। गांधी जी के इस आंदोलन से रवींद्र नाथ टैगोर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने गाँधी जी को महात्मा की उपाधि दे दी। जमीदारो के अंदर काम करने वाले किसान अब भूमि के मालिक हो गए थे। वहां कई स्कूल खुल चुके थे, ताकि गरीब बच्चो को प्रारंभिक शिक्षा दी जा सके। चम्पारण किसान आंदोलन देश की आजादी के संघर्ष का एक मजबूत प्रतीक बन चुका था। यह बात फैल चुकी थी कि एक दुबले पतले आदमी ने एक आंदोलन को सफलतापूर्वक समाप्त किया। 



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