Ebola Virus - इबोला वायरस

Ebola Virus - इबोला वायरस

 इबोला वायरस 

 इबोला वायरस एक प्राणघातक विषाणु है, जिससे होने वाली बीमारी को इबोला वायरस डिजीज (EVD) के नाम से जाना जाता है। ईवीडी पहली बार दो एक साथ हुए प्रकोपों में दिखाई दिया, जिनमे से पहला दक्षिण सूडान तथा दूसरा कांगो में हुआ। यह इबोला नदी  के किनारे एक गांव में हुआ था, इसलिए इसे इबोला नाम दिया गया। यह सर्वप्रथम 1976 में पाया/ खोजा गया था। इबोला वायरस के भीतर 6 प्रजातियो की पहचान की गयी है- ज़ैरे, बुन्डीबुग्यो, सूडान, टाईफॉरेस्ट, रेस्टोन और बोम्बोली।  

Ebola Virus
इबोला वायरस


लक्षण-

इस बीमार से संक्रमित रोगी में इसके लक्षण 2 से 21 दिनों के भीतर देखने को मिलते है। हालाँकि यह एक संक्रामक रोग है, परन्तु यह रोगी से तभी फैलता है जब रोगी में लक्षण दिखने लगते है। प्रारम्भ में इस बीमारी के कारण बुखार, थकान, बदन दर्द तथा जोड़ो में दर्द होने लगती है, और कुछ समय बाद उलटी, दस्त, लाल चकत्ते, लीवर तथा किडनी का  सही से काम न करना कुछ मामलो में आंतरिक और  बाह्य रक्तस्राव होने लगता है। इसके कारण निम्न रक्तचाप (low blood pressure) और शरीर में तरल पदार्थ के कारण रोगी की मृत्यु हो जाती है। इस बीमारी के मरने वालो का औसत 50% है। यह अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग है।  कही यह 21% तो कही यह 90% भी है।  

संक्रमण-

यह माना जाता है कि पेट्रोपोडिदै परिवार के फल खाने वाले चमगादड़ इस वायरस के मेज़बान है अर्थात इसने यह विषाणु फैलता है। यह एक संक्रामक बीमारी है जो-
  • संक्रमित रोगी के खून, उल्टी तथा उसके शरीर के तरल पदार्थो के संपर्क में आने से फैलता है। 
  • इबोला से ग्रसित मर्त व्यक्ति भी इस बीमारी को फैला सकता है। 
  • यह जंगली जानवरो जैसे सूअर से भी फैलता है। 
बहुत बार यह बीमारी स्वास्थ्य कर्मियों को, इस रोग से ग्रसित रोगी के इलाज करने से भी फैलने के नतीजे सामने आये है। जिससे यह भी माना जाता है कि रोगी के अत्यधिक निकट रहने से भी यह फैलती है। यह रोग, रोगी के स्वस्थ्य होने पर भी उसके रक्त में उपस्थित रहता है। इस रोग से ठीक हुई महिला का अपने बच्चे को दूध पिलाने से यह बच्चे को हो सकता है। 

उपचार, रोकथाम तथा नियंत्रण -

 इसके लिए अभी तक कोई पुख्ता इलाज नहीं मिला है, हालाँकि कुछ अन्य तरीको को अपनाया जाता है, लेकिन वो भी शत प्रतिशत कारगर नहीं है, जिनमे रक्त उत्पादों, प्रतिरक्षा चिकित्सा तथा दवाओं से उपचार किया जा रहा है। 2015 में गिनी में वैक्सीन का प्रयोगात्मक परिक्षण किया गया, जिसमे 11841 लोगो पर वैक्सीन का इस्तेमाल किया गया और उनमे अधिकांश में देखा गया की वैक्सीन के बाद इबोला के कोई भी लक्षण नहीं आये ।   
        चूँकि यह एक संक्रामक बीमारी है, जो जानवरो से मनुष्यों में, मनुष्यो से मनुष्यो में फैलती है। इसलिए इसकी रोकथाम तथा नियंत्रण के लिए समाजिक दूरी, रोगी को तुरंत उपचार दिलाना, मर्त रोगी को सुरक्षित और दूर दफनाना या जलाना। लोगो को इसके बारे में जागरूकता फैलाना। स्वाथ्य कर्मचारियों के लिए सुरक्षा उपकरण मुहैय्या कराना आदि है। यह बीमारी से ग्रसित रोगी के स्वस्थ्य होने पर  भी उसके रक्त में कुछ विषाणु रह जाते है इसलिए ऐसे व्यक्तियों से शारीरिक दूरी बनाये रखना जरूरी होता है। 


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