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काकोरी कांड (Kakori Conspiracy)

काकोरी कांड (Kakori Conspiracy)

काकोरी कांड 

आज़ादी की लड़ाई की बात हो और नौ अगस्त सन 1925 की बात न हो ऐसा कैसे हो सकता है।  ये वो दिन था जब आज़ादी के मतवालों ने अंग्रेजी हुकुमत की जड़े तक हिला के रख दी थी।  फरवरी 1922 को चौरी चौरा  में हुई हिंषक घटना के बाद जब गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन  वापस ले लिया तब भारत के युवा वर्ग में खासी नाराज़गी थी,  जिसका निराकरण काकोरी  कांड ने किया। 

Kakori Conspiracy
काकोरी काण्ड के चार अमर बलिदानी:
 (बायें से) राजेन्द्र लाहिडी, अशफाक उल्ला खाँ, 
पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' एवं ठाकुर रोशनसिंह

काकोरी-   काकोरी उत्तर प्रदेश के लखनऊ से लगभग 14 कि मी  उत्तर में स्थित है।क्रांतिकारियों ने इस जगह पर रेलगाड़ी को लुटा था, घटना का काकोरी नामक स्थान पर घटने के कारण इसका नाम काकोरी कांड पडा।  

 

लूट की योजनाएच.आर.ए (हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ) के दो प्रमुख नेता योगेश चंद्र चटर्जी और सचिन्द्रनाथ सान्याल की गिरफ़्तारी के बाद राम प्रसाद बिस्मिल के कन्धों पर उत्तर प्रदेश के साथ साथ बंगाल के सदस्यों का भी उत्तरदायितव आ गया। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के बारे में एक बात कही जाती है, कि वो जो काम एक बार हाथ में ले लेते है, तो उसे पूरा करे बिना नहीं बैठते। उन दिनों पार्टी के कार्य हेतु धन की आवश्यकता बढ़ गयी थी, और बिना धन के स्वतंत्रता आंदोलनों को बड़ा पाना संभव नहीं  था तो उन्होंने छोटी मोती डकैती करना प्रारम्भ किया, 2 डैकिटियों में 2 लोगो की मृत्यु से उनको बहुत ठेस पहुंची जिसके बाद उन्होंने निश्चय किया की अब वे बस सरकारी खजाने को लूटेंगे। इसके बाद 8 अगस्त 1925 को  उनके घर शाहजहांपुर में हुई एक इमरजेंसी मीटिंग में यह तय किया गया कि अगले दिन यानि 9 अगस्त को  शाहजहांपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रैन को लुटा जायेगा। इसके लिए एच.आर.ए के 10 सदस्यों को चुना गया, जिनके नाम निम् लिखित हैं- रामप्रसाद बिस्मिल (इन्होंने पूरी घटना का नेतृत्वा किया ), अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी, चंद्र शेखर आज़ाद, सचिन्द्र बख्शी, केशब चक्रवर्ती, मनमथनाथ गुप्ता, मुकुंद लाल, बनवारी लाल, कुन्दनलाल, तथा  प्रणवेश मुख़र्जी। 


9 अगस्त 1925-  ये वो दिन था जब काकोरी कांड की ऐतिहासिक घटना को अंजाम दिया गया।  क्रांतिकारियों के पास कुछ पिस्तौल तथा 4 माउज़र थे, उन माउज़रों की मारक क्षमता के कारण  उन दिनों ये आज की ए.के 47 के समान चर्चित थी, इसके पीछे लकड़ी का खूंटा लगाकर इसे राइफल की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता था। क्रांतिकारियों ने  वे पिस्तौल बस भय उत्पन्न करने के लिए रखी थी। लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर रुक कर जैसे ही गाड़ी आगे बढी क्रांतिकारी रेलगाड़ी में घुस गए, क्रान्तिकारियों ने आगे जाकर चेन खींचकर उसे रोक लिया,और रेलगाड़ी से सरकारी खजाने के डिब्बे को नीचे गिरा दिया, जब उसको खोलने का प्रयास किया गया तो वह नहीं खुला, तब अशफाक उल्ला खां ने अपनी माउज़र मनमथनाथ गुप्ता के हाथ में थमा दी तथा बक्सा खोलने का प्रयास करने लगा इतने में मनमथनाथ गुप्ता  ने उत्सुकतावश माउज़र का ट्रिगर दबा दिया जिससे छूटी गोली अहमद अली नामक यात्री को जा लगी, जिससे उसकी मृत्य हूँ गयी। शीघ्रतावश चाँदी के सिक्कों व नोटों से भरे चमड़े के थैले चादरों में बाँधकर वहाँ से भागने में एक चादर वहीं छूट गई।  इस डैकती में क्रांतिकारियों ने  4016 रुपए, 15 आने और छह पाई की लूट की थी ,  अगले दिन यह खबर देश-विदेश में विभिन्न समाचार पत्रों के माद्यम से फ़ैल गयी, जिसके कारण अंग्रेज सरकार  ने इसे गम्भीरता से लिया।


क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी -  इस घटना  ने अंग्रेज सरकार की नींद उड़ा दी। अंग्रेज सरकार ने सभी प्रमुख स्थानों पर विज्ञापन लगा दिए की काकोरी कांड के सम्बन्ध में  जो कोई भी जानकारी देगा उसे  इनाम दिया जायेगा। परिणाम यह हुआ कि पुलिस को घटनास्थल पर मिली चादर में लगे धोबी के निशान से इस बात का पता चल गया कि चादर शाहजहांपुर  के किसी व्यक्ति की है। शाहजहाँपुर के धोबियों से पूछने पर मालूम हुआ कि चादर बनारसीलाल की है। बिस्मिल के साझीदार बनारसीलाल से मिलकर पुलिस ने इस डकैती का सारा भेद प्राप्त कर लिया। उसने डैकती से सम्बंधित सारी जानकारी अंग्रेज सरकार को दे दी।इसके पश्चात अँगरेज़ सरकार ने 27 सितम्बर 1925 की रात रामप्रसाद बिस्मिल समेत भारत के विभिन्न हिस्सों से एच.आर.ए के 40 से ज्यादा सदस्यों को गिरफ्तार किया।  



फांसी की सजा - जेल में इन क्रांतिकारियों से मिलने जवाहरलाल नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी  आदि बड़े नेता गए और उनका मुकदमा लड़ने में दिलचस्पी दिखाई। वे चाहते थे की उनका मुकदमा सुप्रसिद्ध वकील गोविन्द वल्लभ  लड़ें परतु उनकी फीस ज्यादा होने के कारण ये मुकदमा कलकत्ता के बीके चौधरी ने लड़ाकाकोरी कांड का मुकदमा लखनऊ की अदालत रिंग थिएटर में लगभग 10 महीने चला। इस पर  ब्रिटिश सरकार के  10 लाख रुपये खर्च हुए। 6  अप्रैल 1927 को इस मुकदमे का फैसला हुआ जिसमें जज हेमिल्टन ने धारा 121अ, 120ब, और 396 के तहत क्रांतिकारियों को सजाएं सुनाईं.  इसमें   रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह(जो काकोरी कांड में शामिल नहीं थे ) और अशफाक उल्ला खां को फांसी की सजा सुनाई गई. शचीन्द्रनाथ सान्याल को कालेपानी और मन्मथनाथ गुप्त को 14 साल की सजा हुई. योगेशचंद्र चटर्जी, मुकंदीलाल जी, गोविन्द चरणकर, राजकुमार सिंह, रामकृष्ण खत्री को 10-10 साल की सजा हुई. विष्णुशरण दुब्लिश और सुरेशचंद्र भट्टाचार्य को 7 और भूपेन्द्रनाथ, रामदुलारे त्रिवेदी और प्रेमकिशन खन्ना को पांच-पांच साल की सजा हुई।  17 दिसंबर 1927 को सबसे पहले गांडा जेल में राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को फांसी दी गई,  उसके पश्चात  19 दिसंबर, 1927 को पं. रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी दी गई, अशफाक उल्ला खां काकोरी कांड के चौथे शहीद थे उन्हें फैजाबाद में फांसी दी गई, काकोरी कांड के तीसरे शहीद थे, ठाकुर रोशन सिंह थे  जिन्हें इलाहाबाद में फांसी दी गई.



शहीदों के अंतिम शब्द-  

 राजेंद्रनाथ लाहिड़ी- फांसी के कुछ दिनों पहले एक पत्र में उन्होंने  अपने मित्र को लिखा था, "मालूम होता है कि देश की बलिवेदी को हमारे रक्त की आवश्यता है, मृत्यु क्या है? जीवन की दूसरी दिशा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं, यदि यह सच है कि इतिहास पलटा खाया करता है तो मैं समझता हूं, हमारी मृत्यु व्यर्थ नहीं जाएगी" सबको अंतिम नमस्ते। 

रामप्रसाद बिस्मिलफांसी के दरवाजे पर पहुंचकर बिस्मिल ने कहा, ‘मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं.’ उनके इन अंतिम शब्दों को भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने अपने जीवन का लक्ष्य बना दिया। रामप्रसाद बिस्मिल की कुछ प्रसिद्द पंक्तियाँ  हैं जो लोगो के दिलों में आज भी जगह बनाये हुए हैं, उनमे से एक निम्न हैं-

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है !


ठाकुर रोशन सिंह-इन्होंने  अपने मित्र को पत्र लिखते हुए कहा था, "हमारे शास्त्रों में लिखा है, जो आदमी धर्मयुद्ध में प्राण देता है, उसकी वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करने वालों की " 

अशफाक उल्ला खां- फांसी से पहले  उन्होंने तख्ते को चूमा और उपस्थित जनता से कहा, "मेरे हाथ इंसानी खून से कभी नहीं रंगे, मेरे ऊपर जो इल्जाम लगाया गया, वह गलत है. खुदा के यहां मेरा इंसाफ होगा" और फंदे पर झूल गए। 


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