अखिल भारतीय मुस्लिम लीग- All-India Muslim league

अखिल भारतीय मुस्लिम लीग- All-India Muslim league

अखिल भारतीय मुस्लिम लीग-

अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का उदय 1905 में हुए बंग-भंग (बंगाल विभाजन) की उस मानसिकता  से हुआ जिसने हिंदु- मुस्लिम अधिकारों में भेद उत्पन्न किया तथा मुसलमानों में राजनैतिक विशेषाधिकार की तृष्णा पैदा की। इस प्रलोभन का एक कारण यह भी था कि आधुनिक राजनैतिक चेतना मुसलमानों के बीच देरी से विकसित हुई थी। सर सय्यद खां और सईद आमिर अली (उस समय के मुस्लिम  नेता) के विचार थे कि "दो सर्वथा भिन्न समुदाय (दो पूरी तरह अलग समुदाय) कांग्रेस के नेतृत्व में नहीं चल सकते हैं" इसके परिणाम स्वरुप मुस्लिम लीग की स्थापना की गई।


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अखिल भारतीय  मुस्लिम लीग कार्यरत कमेटी 

 

लार्ड मिंटो तथा साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग-

लार्ड कर्ज़न के बाद लार्ड मिंटो उस समय भारत के  वाइसराय बने थे। लार्ड मार्ले संवैधानिक सुधारों के पक्षधर थे, तथा मिंटो भी इनके विचारों से सहमत थे।परन्तु  वह  साथ साथ भारत में बढ़ते जन जागरण की तेजी को रोकना चाहते थे, इसलिए वह फूट डालो राज करो की नीति के तहत हिन्दू-मुस्लिम मतभेद को और बढ़ाना चाहते थे। अपने इसी उद्येस्य से उन्होंने अपने सचिव स्मिथ को तत्कालीन अलीगढ कॉलेज के प्रधानाध्यापक वीलियम ए.जे.आर्चीवाल्ड से मिलने भेजा तथा मुसलमानों का प्रतिनिधिमंडल भेजने का सुझाव दिया, इसमें मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल,  साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग पेश करने का सुझाव दिया गया।  इसके पश्चात आर्चीवाल्ड ने मिंटो का सुझाव अलीगढ कॉलेज के सचिव नवाब-मोहसिन-उल-मुल्क के सामने रखा। 

आर्चीवाल्ड ने अपने पत्र  में सुझाव दिया कि "मांग पत्र पर सभी प्रमुख मुस्लिम प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर रखना"। इसी पत्र के आधार पर नवाब-मोहसिन-उल-मुल्क ने भारत के अलग अलग प्रांतों से लगभग 4000 मुसलमानों  के हस्ताक्षर  करवाकर एक प्रार्थना पत्र तैयार किया तथा विभिन्न क्षेत्रों से  35 प्रमुख मुस्लमानों का एक प्रतिनिधि मंडल बनाया गया। सर आगा खां ने इस प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किया। 1 अक्टूबर 1906 को प्रतिनिधिमंडल  तत्कालीन वाइसराय लार्ड मिंटो से मिलने शिमला गया। प्रतिनिधिमंडल ने वाइसराय के सामने साम्प्रदायिक नेतृत्व मांग की। प्रार्थना पत्र में निम्न लिखित मांगे की गई थी-

  1. मुसलमानों को सरकारी सेवाओं में उचित अनुपात में स्थान मिले। 
  2. नौकरियों में प्रतिस्पर्धी तत्व को खत्म किया जाना चाहिए।
  3. प्रत्येक  उच्च न्यायालय तथा न्यायालय में मुसलमानों को भी न्यायाधीश का पद मिले। 
  4. नगर पालिकाओं में दोनों समुदायों के प्रतिनिधियों को भेजने के लिए अलग से सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए।
  5. विधान परिषद  के लिए मुस्लिम वकीलों, जमीदारों, व्यापारियों, जिला परिषदों और नगर पालिकाओं के मुस्लिम सदस्यों  और पांच साल के अनुभव वाले मुस्लिम स्नातकों  के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल गठन किया जाना चाहिए।
  6. वाइसराय की  कौंसिल में भारतियों की नियुक्ति के समय मुसलमानो के हितों का ध्यान रखा जाए। 
  7. मुस्लिम विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाए। 
इसके पश्चात वाइसराय मिंटो ने  प्रतिनिधि मंडल की प्रशन्नता व्यक्त की और उत्तर  में एक लम्बा  पत्र लिखा तथा मुसलमानों को संरक्षण देने की बात स्वीकार कर ली। लार्ड मिंटो  ने कहा था "मुस्लिम समुदाय को इस बात से पूर्णतः निश्चिन्त रहना चाहिए कि उनके साथ भेदभाव किया जाएगा और मेरे द्वारा जो प्रशासनिक पुनर्संगठन किया जायेगा उसमे मुस्लिमो के अधिकार और हित सुरक्षित रहेंगे"।



आल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना-

लार्ड कर्ज़न की प्रेरणा से  ढाका नवाब ख्वाजा सलीमुल्लाह तथा हबीबुल्लाह ने बंगाल विभाजन समर्थक आंदोलन का नेतृत्वा किया था। मोहम्डन एजुकेशनल कांफ्रेंस (इसकी स्थापना  सर सय्यद खां ने की थी, तथा इसकी स्थापना के समय यह बात कही गयी थी कि इसमें कभी राजनैतिक मुद्दों पर बात नहीं होगी)। लेकिन इस अधिवेशन में प्रथम बार किसी राजनैतिक मुद्दें पर बात हुई, तथा  नवाब ख्वाजा सलीमुल्लाह, नवाब आगा खां, नवाब मोहसिन-उल-मुल्क ने भारतीय मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा के लिए 30 दिसंबर 1906 को ढाका में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का गठन किया। इसके गठन का पूरा श्रेय लार्ड मिंटो को जाता है। 


मुस्लिम लीग का कांग्रेस से समझौता (लखनऊ पैक्ट)-

1908 में मुस्लिम लीग ने अपने अमृतसर अधिवेशन में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की यह मांग 1909 के मार्ले मिंटो सुधार के द्वारा स्वीकार कर दी गई थी।  दिसंबर 1911 में दिल्ली दरबार में बंगाल विभाजन को वापस ले लिया गया । जिससे मुस्लिम समुदाय को बहुत बड़ा धक्का लगा  और उन्हें एहसास हुआ की ब्रिटिश  सरकार के लिए मुस्लिम नहीं साम्रज्यवादी हित सर्वोपरि हैं।  इसके पश्चात अगस्त 1912  में अलीगढ कॉलेज को विश्वविद्यालय बनाने का प्रस्ताव मुस्लिम समुदाय द्वारा रखा गया, जिसको तत्कालीन वायसराय लार्ड हार्डिंग ने अस्वीकार  कर दिया, जिसके बाद मुस्लिम समुदाय में असंतोष बढ़ गया। इसकी बहुत आलोचना हुयी इसके बाद लीग की स्थापना में मुख्य भूमिका अदा करने वाले  नवाब ख्वाजा सलीमुल्लाह, नवाब आगा खां, ने संगठन छोड़ दिया, जिसके बाद  लीग का  नेतृत्व मोहम्मद अली जिन्नाह के हांथों में चला गया। 1916 में जिन्नाह की अध्यक्षता में मुस्लिम लीग तथा अम्बिका चरण मज़ूमदार की अध्यक्षता में कांग्रेस का अधिवेशन एक ही समय पर लखनऊ में हुआ और इसी अधिवेशन में इन दोनों दलों में एक समझौता हुआ जिसे लखनऊ पैक्ट नाम से जाना  जाता है।  


अखिल भारतीय मुस्लिम लीग तथा पाकिस्तान का निर्माण-

पाकिस्तान बनने के अहम् पड़ाव में  23 मार्च 1940  का दिन आया, इस दिन मुस्लिम लीग ने लाहौर में एक प्रस्ताव रखा, जिसे  पाकिस्तान प्रस्ताव के नाम से भी जाना जाता है। इसके तहत एक अलग मुस्लिम देश बनाने की मांग रखी गयी, हालांकि यह मांग 1930 से चली आ रही थी और अलग राष्ट्र के लिए पाकिस्तान नाम का सुझाव भी रख दिया गया था। जिसके फलस्वरूप 14 अगस्त 1947 को पृथक देश पाकिस्तान बना जिसकी ज्यादातर आबादी मुस्लिम थी। आल इंडिया मुस्लिम लीग को पाकिस्तान बनने के बाद मुस्लिम लीग कर दिया गया। और इस प्रकार अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की समाप्ति हुई।

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