जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड- Jallianwala Bagh Massacre

जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड- Jallianwala Bagh Massacre

जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड-

13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग में एक ऐसी घटना हुई जिसने स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों को और तीव्र कर दिया। 13 अप्रैल 1919 को बैशाखी के दिन जलियाँवाला बाग में 5000 लोग इकठ्ठा हुए थे, जिस पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर ने गोलीबारी कर दी। जिसमे कई लोग मारे गए इसलिए इसको जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के नाम से जाना जाता है।

 
Jallianwala Bagh Massacre
जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड 

प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिको ने गाँधी जी के कहने पे हिस्सा लिया, जिसके बदले गाँधी जी ने भारत की आज़ादी की मांग रखी थी और अंग्रेज़ सरकार ने पहले तो उसके लिए हामी भरी परन्तु प्रथम विश्व युद्ध जीतते-जीतते अपनी बात से मुखर गए और उसके पश्चात भारत में रौलेट एक्ट पारित कर दिया जिसके विरोध में पुरे देश में आंदोलनो की भीड़ उमड़ पड़ी। 
 

क्या था रौलेट एक्ट?

प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में बहुत बड़ी मात्रा में आंदोलन होने  लगे, ब्रिटिश सरकार द्वारा उभर रहे इन राष्ट्रीय आंदोलनों को कुचलने के लिए एक अधिनियम पारित किया गया। यह अधिनियम सिडनी रौलेट  की सेडिशन समिति की शिफारिशों के आधार पर बनाया गया था इसलिए इसे रौलेट एक्ट या रौलेट अधिनियम भी कहते हैं। इसके अनुसार किसी भी अपराधी को बिना किसी मुकदमे के गिरफ्तार किया जा सकता था तथा इसमें अपराधी के पास यह अधिकार भी नहीं था कि वो जान सके किसने उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज  किया है। इसे लोग काला कानून के नाम से भी पुकारते थे। 

        जलियाँवाला बाग पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्थित है। बैशाखी पूरे भारतवर्ष में मनाया जाने वाला एक त्यौहार है, इसको सिक्ख समुदाय द्वारा बड़ी धूमधाम से मनाया  जाता है। 13 अप्रैल 1919 को नेताओं ने जलियाँवाला बाग में शांति, अहिंसा पूर्वक भाषण देने के लिए लोग इक्क्ठा किये थे, जो कि उस समय हुए दो नेताओं सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन किचलू को कालापानी की सजा होने तथा रौलट एक्ट पारित करने के खिलाफ धरना था। बैशाखी के दिन कई लोग शहर घूमने तथा मेला देखने आये थे और जानकारी मिलते ही जलियाँवाला बाग में इकठ्ठा होने लगे। 

 जलियाँवाला बाग और जनरल डायर-

जनरल डायर को जब पता चला कि जलियाँवाला बाग में हज़ारों लोग इकठ्ठा हो चुके हैं, तो वह हथियारों से लेस अपनी सेना को लेकर वहां पंहुचा तथा चारों ओर से बाग में उपस्थित लोगो को घेर दिया। वहां पर शांति पूर्ण तरीके से इकठ्ठा निहत्थे और बेगुनाह लोगो पर गोलियों की बौछार कर दी। जिससे वहां मौजूद लोगो में अफरा-तफरी मच गयी, वहां से निकलने का एक मात्र संकरा रास्ता भी जनरल डायर ने बंद करवा दिया था और वहां पर भी सेना मौजूद थी लोगो ने बचने के लिए बाग में स्थित कुएं में छलांग लगाना उचित समझा परन्तु अनेक लोगो के कूदने से नीचे मौजूद लोगो की जान चली गयी। ज्ञात आंकड़ों के अनुसार जनरल  डायर ने 1650 राउंड कारतूस चलवाये थे, जिससे कई लोगो की जान गयी और अनेकों घायल हुए, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार मरने वालों की संख्या 484 थी, परन्तु अनाधिकारिक तौर पर मरने वालों की संख्या 1800 के आसपास तथा घायलों की संख्या लगभग 2000 के आसपास बतायी जाती है। कर्फ्यू लगे होने  के कारण घायलों को अस्पताल नहीं ले जाया जा सका और उन्होंने भी  मौके  पर ही दम तोड़ दिया। 
           जनरल  डायर ने टेलीग्राफ द्वारा उच्च अधिकारियों को यह सूचना  दी कि उस पर हमला कर रहे आंदोलनकारियों पर उसने गोलीबारी कर दी, जिसकी उच्च अधिकारियों द्वारा प्रसंशा भी की गयी। 

जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के परिणाम-

जलियाँवाला  बाग हत्याकाण्ड की हर जगह निंदा होने लगी और लोगो में आक्रोश फैल गया और स्वतंत्रता आंदोलन की गति और तीव्र हो गयी। और इसके पश्चात ही गाँधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन की शुरुवात की गयी। इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने लार्ड हंटर की अध्यक्षता में हंटर कमेटी का गठन किया और इसमें जनरल डायर दोषी साबित हुए और उन्हें पदावनति कर कर्नल बना दिया और उनके भारत में कार्यकाल  को समाप्त कर उन्हें वापस इंग्लैंड भेज दिया गया। 
    कहते हैं कि उन्हें वहां पर प्रशस्ति पत्र देने की योजना भी की गयी थी, परन्तु वैश्विक दबाव के कारण नहीं दिया गया तथा उन्हें सेवा से विमुक्त कर दिया गया। इस हत्याकाण्ड में जख्मी हुए एक आंदोलनकारी उधम सिंह ने तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल फ्रांसिस डायर की 13 मार्च 1940 को गोली मारकर हत्या कर दी जिसके लिए उनको फांसी की सजा दी गयी। 

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