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साइमन कमीशन का भारत आगमन- Simon Commission

साइमन कमीशन का भारत आगमन- Simon Commission

साइमन कमीशन -

 ब्रिटिश पार्लियामेंट में सन 1919 में , गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट 1919 या मोंटागु चैम्सफोर्ड रिफार्म पास हुआ। इसकी  खास बात यह थी कि इस एक्ट  के द्वारा   ब्रिटिश सरकार ने भारतीय शासन व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना आरम्भ कर दिया। इसी एक्ट ऑफ़ 1919 में एक प्रावधान यह  भी था, कि इस एक्ट (गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट 1919) के लागू होने के 10 साल बाद यानि 1929 में एक कमीशन (आयोग) नियुक्त किया जायेगा जो मोंटागु चैम्सफोर्ड रिफार्म के प्रभाव और प्रगति  की जांच करके एक रिपोर्ट तैयार करेगा और आगे के  संवैधानिक सुधार क्या-क्या होने चाहिए इसकी सिफारिश और प्रस्ताव रखेगा। परन्तु जो कमिशन  1929 में आना था उसे 1927 में गठित करके 1928 में  भारत भेज दिया गया। जिसे साइमन कमीशन नाम दिया गया। 

साइमन कमीशन का गठन किस प्रकार हुआ?

 साइमन कमीशन  की नियुक्ति तत्कालीन  ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टैनले बैल्डविन  ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में की थी। साइमन कमीशन का गठन 8 नवंबर 1927 को हुआ था। इसमें कुल 7 सदस्य थे जो सभी ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा मनोनीत थे। चूँकि सर जॉन साइमन इस कमीशन का नेतृत्व कर रहे थे, इसलिए इसका नाम  साइमन कमीशन रखा गया। 1927 में लार्ड बर्केनहेड भारत के राज्य सचिव थे। माना जाता है कि साइमन कमीशन की स्थापना के लिए लार्ड बर्केनहेड ही जिम्मेदार थे। इसमें कोई भी भारतीय न होने का कारण, लार्ड बर्केनहेड का यह कहना कि भारतीय अभी देश चलाने के काबिल नहीं है, वो इतने सक्षम नहीं है कि संविधान का निर्माण कर सके था।  
 

साइमन का भारत आगमन, विरोध तथा विस्तार-

 इस कमीशन में  कोई भी भारतीय नहीं था। जिसके कारण इसे स्वेत कमीशन भी कहा जाता है।जबकि गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट 1919 में ब्रिटिश सरकार ने कहा था की भारतीय शासन व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी होगी, इसमें किसी भी भारतीय का न होना भारतीय क्रान्तिकारी नेता व संगठन जैसे माहत्मा गाँधी,लाला लाजपत राय, पंडित जवाहर लाल नेहरू तथा आरएसएस को राष न आया। इसलिए उन्होंने भारत की जनता से इसका बहिष्कार करने का आग्रह किया। वही दूसरी ओर डॉ बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर, चौधरी छोटूराम जी, शिवदयाल सिंह चौरसिया जैसे जातिवादी नेताओं ने इसका खुलकर समर्थन किया  साइमन कमीशन  3 फरवरी 1928 को भारत पंहुचा। साइमन कमीशन भारत के जिस भी हिस्से में गया चाहे वो कलकत्ता हो ,चाहे लाहौर हो या पुणे उसे कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। "साइमन गो बैक " के नारों से उसका विरोध किया गया।  काले झंडे दिखाकर उसका जमकर विरोध किया, कई जगहों पर हड़ताल हुए तो कही शहर/प्रान्त बंद का आवहन किया गया। लाहौर में कमिशन 30 अक्टूबर 1928 को पंहुचा। लाहौर में साइमन के विरोध का नेतृत्वा शेर-ए -पंजाब लाला लाजपत राय ने किया। जहाँ से कमीशन के सदस्यों को निकलना था वहां भीड़ बहुत थी तब पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने लाठी चार्ज के आदेश दे दिए, प्रदर्शनकारियों पर जमकर लाठियां बरसाई गयी जिसमें लाला जी को भी गंभीर चोटें आयी  जिसके परिणाम स्वरुप 17  नवंबर  1928 को उनका देहांत हो गया। मरने से पहले उनके द्वारा कहे गए कुछ शब्द-
"आज मेरे उप्पर बरसी हर एक लाठी की चोट अग्रेजो के ताबूत की कील बनेगी"

नेहरू की रिपोर्ट-

जब साइमन कमीशन के विरोध की बात ब्रिटिश प्रधानमंत्री  स्टैनले बैल्डविन के कानों तक पहुंची तो उन्होंने कहा की अब कमीशन को खारिज तो नहीं कर सकते पर अगर भारतीय पार्टियां चाहे तो वे भी एक ऐसी ही रिपोर्ट  तैयार करे जो भारतीय समाज के हर तपके को मंजूर हो,भारतीय नेताओं ने इसी एक चुनौती की तरह लिया, फरवरी  1928 के सभी दलों के सम्मेलन में संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक उप-समिति का गठन किया। यह भारतीयों द्वारा देश के लिए एक संवैधानिक ढांचे का मसौदा तैयार करने का पहला बड़ा प्रयास था। मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित इस उप-समिति में 2 मुस्लिम सहित 9  सदस्य थे। इसी उप-समिति ने अगस्त 1928 में  एक रिपोर्ट तैयार करी जो की  बर्केनहेड नामक अँगरेज़ के द्वारा भारतियों के संविधान को बनाने के अयोग्य बताने की चुनौती का सशक्त प्रत्युत्तर था। इसी रिपोर्ट को आगे चलकर नेहरू रिपोर्ट नाम दिया गया। परन्तु 1930 में ब्रिटिश गवर्नमेंट ने इसे अत्यधिक प्रगतिशील बताकर इसे मानने से इंकार कर दिया। 



साइमन के भारत आने के क्या परिणाम रहे?
सभी प्रांतो में साइमन गो बैक के नारो से उसका स्वागत किया गया। लाला लाजपत राय के देहांत से यह जनांदोलन और भी क्रूर प्रवर्ति धारण कर बैठा, भगत सिंह और उनके मित्रो के लिए यह राष्ट्र का अपमान था और उन्होंने तय किया कि "खून का बदला खून से लिया जायेगा"।17 दिसंबर को राजगुरु और भगत सिंह ने सांडर्स को स्कॉट समझकर उसपर गोलियां बरसा कर उसकी हत्या कर दी  और उसके पश्चात यह क्रांतिकारी वहां से निकल कर कोलकाता पहुंचे और वहां पहुंच कर असेंबली में बम फेंकने की रणनीति बनाई गयी। 08 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में दो बम दाग दिए जिसके कारण उनको गिरफ्तार कर लिया गया और भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को सांडर्स की हत्या, दंगे भड़काने तथा असेंबली में बमबारी करने के लिए फांसी की सजा सुनाई गयी। 23 मार्च 1931 को इन महान क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गयी और उन्हें इतिहास के पन्नो में अमर कर दिया गया। 
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