गुप्त वंश (The Gupta Period)

गुप्त वंश (The Gupta Period)

गुप्त वंश

मौर्यों के पतन के बाद, गुप्त वंश प्रभुत्व  में आया। श्रीगुप्त और घटोत्कच गुप्त वंश के  शुरुवाती शासक थे। चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक था।  

चन्द्रगुप्त प्रथम ( 319ई.-324ई. )-

  1. गुप्त अभिलेखों से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त प्रथम स्वतंत्र शासक था। जिसकी उपाधि महाराजाधिराज थी। 
  2. चन्द्रगुप्त प्रथम, गुप्त वंश के द्वितीय शासक घटोत्कच का पुत्र था। श्रीगुप्त, गुप्त वंश का प्रथम शासक था। 
  3. चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त सम्वत की स्थापना 319-20 ई. में की थी। 
  4. चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया था। इस समय लिच्छवियों के दो राज्य थे-पहला वैशाली का राज्य तथा दूसरा नेपाल का राज्य। 
  5.  कुमार देवी से विवाह करके चन्द्रगुप्त प्रथम ने वैशाली का राज्य प्राप्त कर लिया। 
  6. गुप्त वंश  चन्द्रगुप्त प्रथम  सर्वप्रथम रजत मुद्राओं का प्रचलन करवाया। 

समुद्रगुप्त ( 325ई.- 375ई. )-

  1. चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद उसका पुत्र समुद्रगुप्त, गुप्त वंश का शासक बना।  वह लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से उत्पन्न हुआ था। 
  2. समुद्रगुप्त का शासनकाल राजनैतिक एवं सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टियों से गुप्त साम्राज्य  के उत्कर्ष का काल माना जाता है। 
  3. समुद्रगुप्त के विषय में यद्यपि अनेक शिलालेखों, स्तम्भलेखों, मुद्राओं, व साहित्यिक ग्रंथो से व्यापक जानकारी प्राप्त होती है, परन्तु सौभाग्य से समुद्रगुप्त पर प्रकाश डालने वाली अत्यंत प्रामाणिक सामग्री प्रयाग प्रशस्ति के रूप में उपलब्ध है। 
  4. राजसिहांसन पर आसीन होने के पश्चात समुद्रगुप्त ने दिग्गविजय की योजना बनाई। प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार इस योजना का धेय था धरणि-बंध (भूमण्डल को बांधना ) था। 
  5. समुद्रगुप्त गुप्त वंश का एक महान योद्धा तहा कुशल सेनापति था, इसी कारण उसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है। 
  6. समुद्रगुप्त का साम्राज्य पूर्व में ब्रह्मपुत्र, दक्षिण में नर्मदा तथा उत्तर में कश्मीर की तलहटी तक विस्तृत था। 
  7. समुद्रगुप्त एक उच्च कोटि का कवि था, जो कविराज के नाम से कविता लिखा करता था। 

चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) 380ई.-412ई.-

  1. समुद्रगुप्त के पश्चात रामगुप्त नामक दुर्बल शासक के अस्तित्व की जानकारी गुप्त वंशावली में निहित है, तत्पश्चात चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम है। जो रामगुप्त का अनुज भाई था। 
  2. चन्द्रगुप्त द्वितीय के  शासनकाल में गुप्त साम्राज्य चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो गया था। 
  3. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने वैवाहिक संबंधों और विजय दोनों प्रकार से गुप्त साम्राज्य का विस्तार किया था। 
  4. चन्द्रगुप्त द्वितीय का का साम्राज्य पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर हिमालय की तलहटी से दक्षिण में नर्मदा नदी तक विस्तृत था। 
  5.  चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में उसकी प्रथम राजधानी पाटलिपुत्र और द्वितीय राजधानी उज्जयिनी थी, ये दोनों ही नगर  शिक्षा के प्रसिद्द केंद्र थे। 
  6. चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासनकाल साहित्य और कला का स्वर्ण युग कहा  है। 
  7. चंद्रगुप्त द्वितीय के दरवार में विद्वानों एवं कलाकारों को आश्रय प्राप्त था। उसके दरबार में नौ रत्न थे- इनमें कालिदास, धन्वंतरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, बैताल, घटकर्पर, वराहमिहिर और वरुचि उल्लेखनीय हैं। 
  8. चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में चीनी यात्री फाह्यान भारत यात्रा पर  आया था। 

स्कंदगुप्त (455ई.-467ई.)-

  1. चन्द्रगुप्त द्वितीय के बाद कुमारगुप्त प्रथम राजा बना। परन्तु पुष्यमित्रों के आक्रमण के दौरान ही गुप्त शासक कुमारगुप्त की मृत्यु हो गयी थी।  अतः कुमारगुप्त की मृत्यु के पश्चात उसका प्रतापी पुत्र सिहांसणरुढ़ हुआ। स्कंदगुप्त, गुप्त वंश का अंतिम प्रतापी शासक था। 
  2. स्कंदगुप्त ने देवराज, विक्रमादित्य, क्रमादित्य आदि उपाधियाँ धारण की थी। 
  3. स्कंदगुप्त ने मौर्यों द्वारा निर्मित सुदर्शन झील का जीर्णोद्वार करवाया था। 
  4. स्कंदगुप्त की मृत्यु 467 ई. में हुई थी। 
  5.  स्कंदगुप्त के बाद  का कोई भी गुप्त शासक हूणों को रोकने में सफल नहीं हो सका तथा गुप्त साम्राज्य विखंडित हो गया। 
  • पुष्यमित्रों पर विजय- कुमारगुप्त के शासनकाल के अंतिम चरण में गुप्त साम्राज्य पर पुष्यमित्रों द्वारा आक्रमण किया गया था। पुष्यमित्रों के विरुद्ध युद्ध में गुप्त सेना का नेतृत्व स्कंदगुप्त ने ही किया था। स्कंदगुप्त की यह विजय अन्यन्त महत्वपूर्ण थी। 
  • हूणों पर विजय-  हूणों का गुप्त साम्राज्य पर आक्रमण स्कंदगुप्त के शासनकाल  घटना थी। हूण बर्बर योद्धा थे, जो मध्य एशिया के खानाबदोश लोग थे। स्कंदगुप्त के सिहांसणरुढ़ होते ही हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा।  स्कन्दगुप्त ने अत्याचारी हूणों को परास्त कर न केवल गुप्त साम्राज्य की रक्षा की अपितु आर्य सभ्यता एवं संस्कृति को भी नष्ट होने से बचाया। 

गुप्तकाल में सांस्कृतिक विकास-

प्रशासन- 
  • राजाओं  परमेश्वर, महाराजाधिराज,  आदि नामों से पुकारा जाता था।  
  • कुमारमात्य सबसे प्रमुख अधिकारी होते थे।  
  • केंद्र में मुख्य विभाग सैन्य था।  संधि विग्राहक सेना का मुख्य अधिकारी होता था। 
  • गुप्तवंशी शासकों ने बड़ी संख्या में सोने के सिक्के जारी किये जिन्हे दीनार कहा जाता था। 

सामाजिक विकास- 
  • जातियां, उपजातियों में विभक्त हो गयी थी। 
  •  स्त्री की दशा पहले से निम्न हो गयी थी। इसी काल में सती प्रथा की प्रथम घटना का उल्लेख मिलता है। 
  • कुमारगुप्त के शासन के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय  स्थापना की गयी थी। 
  •  फाह्यान के अनुसार, चाण्डाल समाज से बहिस्कृत थे और गांव से बहार बसा करते थे।  उच्च  उनसे घृणा करते थे। 
धर्म-
  • बौद्ध धर्म का प्रचलन कम होता जा रहा था।  
  • वर्तमान में प्रचलित हिन्दू धर्म के स्वरुप का निर्माण इसी युग में हुआ।  भगवतगीता की भी रचना इसी युग में हुई। 
  • विष्णु इनके इष्ट देवता थे। 
  • मूर्ति पूजा सामान्य तौर पर प्रचलन में आ चुकी थी। 

कला-  
  •  गुप्त युग में विविध प्रकार की कलाओं यथा मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तुकला, संगीत, व नाट्य कला तथा मुद्रा कला क्षेत्र में आशातीत उन्नति हुई। 
  • सारनाथ की बुद्धमूर्ति, मथुरा की वर्धमान महावीर की मूर्ति, विदिशा की वराह अवतार की मूर्ति, झाँसी  शेषशायी विष्णु की मूर्ति, कांशी की  गोवर्धनधारी  कृष्ण की मूर्ति आदि इस युग की मूर्तिकला के प्रमुख उदाहरण हैं। 
  •  बामियान (अफ़ग़ानिस्तान) की बौद्ध मूर्तियां भी इसी काल से सम्बंधित थी। 
  • अजंता की गुफाओं के चित्र इस युग की चित्रकला के सर्वोत्तम उदाहरण हैं।
E-gyankosh


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