पुष्यभूति या वर्धन वंश (Pushyabhuti Dynasty)

पुष्यभूति या वर्धन वंश (Pushyabhuti Dynasty)

पुष्यभूति या वर्धन वंश

इस वंश को वर्धन वंश भी कहा जाता है। गुप्तों के बाद उत्तर भारत में सबसे विस्तृत साम्राज्य की स्थापना इन्होने ही की। इस वंश का उदय हरियाणा के थानेश्वर में हुआ था। बाणभट्ट के अनुसार इस वंश का संस्थापक पुष्य भावना शैव मत का अनुयायी था। लेकिन पुरातात्विक स्त्रोतों में उसका नाम नहीं मिला है। इस वंश का इतिहास जानने के लिए बौद्ध ग्रन्थ आर्यमंजुशुल्लेख और महाकवि संचार का हर्षचरित महत्वपूर्ण है। हर्षचरित्र, कादंबरी, लेखनाथ का लेखक बाणभट्ट  हर्षवर्धन का दरबारी कवि था। पूर्व में  हर्ष के साम्राज्य की राजधानी थानेश्वर थी। परन्तु हर्ष ने इसे कन्नौज स्थानांतरित कर दिया। प्राचीन स्रोतों के अनुसार इस वंश का पहला शासक नरवर्धन था तथा अंतिम शासक हर्षवर्धन था। 

नरवर्धन - राज्यवर्धन - आदित्यवर्धन - प्रभाकर वर्धन - राज्यवर्धन द्वितीय - हर्षवर्धन। इस वंश के क्रमश शासक थे। 

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प्रभाकर वर्धन- 

यह प्रतापशील नाम से भी विख्यात था। यह इस वंश का प्रथम शासक था जिसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। इसकी पत्नी का नाम यशोमती था, जो की इसकी मृत्यु के पश्चात सती हो गयी। प्रभाकर वर्धन की तीन संतानें थी, राज्यवर्धन, हर्षवर्धन, और राज्यश्री। 

हर्षवर्धन (606-647 ई.)-

  • हर्षवर्धन का जन्म 591ई. के लगभग हुआ था।  वह प्रभाकर वर्धन का छोटा पुत्र था। 
  • बड़े भाई राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद हर्षवर्धन थानेश्वर के राजसिहांसन पर आसीन हुआ। 
  • जिस  समय हर्षवर्धन थानेश्वर के राजसिहांसन पर बैठा उस समय राज्य की स्थिति काफी संकटपूर्ण थी, क्योंकी गौड़ नरेश शशांक द्वारा उसके भाई का वध कर दिया गया था और उसकी बहन राज्यश्री अपने प्राण बचाने के लिए अज्ञातवास को चली गई थी। 
  • राज्यारोहण के समय हर्ष के सम्मुख दो प्रमुख समस्याएं थीं- पहला था गौड़ नरेश शशांक को मारकर अपने बड़े भाई राज्यवर्धन की हत्या का बदला लेना तथा दूसरा था अपनी बहन राज्यश्री को ढूढ निकालना। 
  • हर्षवर्धन ने एक भिक्षु दिवाकर मित्र की सहायता ने अपनी बहिन राज्यश्री को ढूंढ निकाला। 
  • दक्षिण में उसकी सेनाओं को 620ई. में चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय को नर्मदा के तट से पीछे खदेड़ दिया था। 
  • हर्ष वर्धन अपने 40 वर्ष के लम्बे शासनकाल में निरंतर युद्धों में संलग्न रहा। उसके द्वारा अंतिम युद्ध 643ई. में गंजाम में लड़ने का उल्लेख मिलता है। 
  • हर्षवर्धन ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी, जिसकी सीमाएं हिमाच्छादित पर्वतों तक, दक्षिण में नर्मदा नदी के तट तक, पूर्व में गंजाम तथा पश्चिम की वल्लभी तक विस्तृत थीं। उसके इस विशाल साम्राजय की राजधानी कन्नोज थी। 
  • हर्षवर्धन एक उच्चकोटि का कवि भी था। उसने संस्कृत में नागानंद, रत्नावली तथा प्रियदर्शिका नामक नाटकों की रचना की थी। 
  • हर्षवर्धन ने अपने राजदरबार में कादंबरी  हर्षचरित के रचियता बाणभट्ट, सुभाषितवलि के रचियता मयूर और चीनी विद्वान हेन्सांग को आश्रय प्रदान किया था। 
  • हर्षवर्धन की मृत्यु 647 ई. में हुई थी। चूंकि वह निःसंतान था, अतः उसकी मृत्यु के साथ वर्धन वंश का अंत हो गया।   
  
E-gyankosh


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