मूल कर्त्तव्य  (Fundamental Duties )

मूल कर्त्तव्य (Fundamental Duties )

मौलिक कर्तव्य अथवा मूल कर्त्तव्य-

अधिकतर लोगो द्वारा मौलिक कर्त्तव्य और मौलिक अधिकारों में अंतर करना कुछ मुश्किल सा होता है कर्तव्य और अधिकार दो अलग अलग शब्द है और काफी भिन्नता भी इन दोनों के बीच देखने को मिलती है।मौलिक अधिकार देश के व्यक्तियों को प्राप्त अधिकार है जो कि सामान्यतया एक लोकतान्त्रिक देश में देशवाशियो को प्राप्त होते है परन्तु मौलिक कर्तव्य देशवासियो के देश तथा संविधान और उसके कानून के प्रति दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है। कुछ प्रश्न जिनका उत्तर एक लोकतान्त्रिक देश के हर स्वतंत्र देशवासी को पता होना चाहिए कि  मौलिक कर्तव्यों का क्या अर्थ है ? मौलिक कर्तव्य कितने प्रकार के होते है? मौलिक कर्तव्यों की परिभाषा क्या है ? 
मौलिक कर्तव्य
संविधान में अंकित मौलिक कर्तव्य
 

मौलिक कर्त्तव्यों की उत्पत्ति- 

जब संविधान अपनाया गया उस समय संविधान में मूल कर्तव्यों का प्रावधान नहीं था। इन्हें 1970 में संविधान में जोड़ा गया। यद्यपि संविधान के अनुच्छेद 33 में केवल सैन्य बलों तथा पुलिस बलों को यह कर्त्तव्य दिया गया कि वे हमेशा अपना कर्त्तव्य चाहे वह ड्यूटी के प्रति हो या देश के प्रति उसे ठीक से निभायें तथा अनुशासन बनाये रखें। बाद में 1976 में 42 वें संशोधन के माध्यम से संविधान में मूल कर्तव्यों को शामिल किया गया था इस संशोधन के अनुसार नागरिकों को कुछ कर्तव्यों का पालन करने को कहा गया है। 42 वा संशोधन  स्वर्ण सिंह समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों के बाद किया गया इस समिति ने संविधान में एक नया भाग शामिल करने की सिफारिश की गयी थी जिसमें नागरिकों के मौलिक कर्तव्य हो। इस सिफारिश को आधार मानकर ही संविधान में परिवर्तन किया गया जो जनवरी 1977 से लागू हुआ । 2002 में 86 वें संविधान संशोधन के माध्यम से पुनः विस्तृत किया गया। मूल कर्तव्यों के अनुच्छेद 51ए में लिखित प्रावधान से मेल खाते है। इसमें कहा गया है कि प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपना विकास स्वयं कर सके। संविधान में संशोधन करने के पश्चात मौलिक कर्तव्यों की संख्या कुल 11 तय की गयी, जिनका विवरण निम्न प्रकार है।

देश के प्रति नागरिको का कर्तव्य -

देश के प्रति नागरिको का कर्तव्य  संविधान के 51 ए में 11 कर्तव्यों के माध्यम से उल्लेखित किये गए है। जो कि निम्न प्रकार है।
  1. संविधान  का पालन करे और उसके आदर्शो, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें।
  2.  स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों का पालन करे।
  3. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे।
  4. देश की रक्षा करे और आहवान किये जाने पर राष्ट्र की सेवा करे। 
  5.  भारत के सभी लोगों को समरसता और समान भातद्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म भाषा और वर्ग या क्षेत्र पर आधारित हो और सभी भेदभाव से परे हो. ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के समान के विरूद्ध हो।
  6. हमारी समसामयिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिपक्ष्य करें
  7. प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव है, रक्षा करे और उसका संवर्द्धन करे तथा प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखे।
  8.  वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे। 
  9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहे।
  10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की और बढ़ने का प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए, प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले।
  11.  माता-पिता अथवा अभिभावक अपने 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करें। 

मौलिक कर्तव्यों की आलोचना-

आलोचना प्रकृति का नियम है कोई भी चीज आलोचनाओं से अछूती नहीं रही मौलिक कर्तव्यों की भी आलोचना होती रही है।मौलिक कर्तव्यों की आलोचना के लिए जो मुख्य बिंदु है वो कुछ इस प्रकार है। 
  • मौलिक कर्तव्यों की सूची अधूरी है इसमें कर अदा करना, मतदान करना तथा परिवार नियोजन इत्यादि कर्तव्य समाहित नहीं है। 
  • कुछ कर्तव्य बहुअर्थी अस्पष्ट तथा आमजन के समझने में मुश्किल है  जैसे उच्च आदर्श, मिश्रित संस्कृति आदि। न्यायालय द्वारा अपरिवर्तित होने के कारन यह नैतिक नियम मात्र रह जाते है। 
  • आलोचकों का यह भी मानना है कि मौलिक कर्तव्यों को भाग 3 में मौलिक अधिकारों के बाद रखना चाहिए था। 

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