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औद्योगिक क्रांति के विषय में तर्क वितर्क

औद्योगिक क्रांति के विषय में तर्क वितर्क

औद्योगिक क्रांति के विषय में तर्क-वितर्क

 औद्योगिक क्रांति' शब्द का प्रयोग ब्रिटेन में 1780 के दशक से 1820 के दशक के बीच हुए औद्योगिकी विकास व विस्तारों के लिए करते थे। लेकिन उसके बाद इस शब्द के प्रयोग को अनेक आधार पर चुनौती दी जाने लगी।

दरअसल औद्योगीकरण की क्रिया इतनी धीमी गति से होती रही कि इसे 'क्रांति' कहना ठीक नहीं होगा। इसके द्वारा पहले से मौजूद प्रक्रियाओं को ही आगे नए स्तरों तक लाया गया। इस प्रकार, फैक्ट्रियों में श्रमिकों का जमावड़ा पहले की अपेक्षा अधिक हो गया और धन का प्रयोग भी पहले से अधिक व्यापक रूप से होने लगा।


उन्नीसवीं शताब्दी शुरू होने के काफी समय बाद तक भी इंग्लैंड के बड़े-बड़े क्षेत्रों में कोई फैक्ट्रियाँ या कारखाने नहीं थे, इसलिए 'औद्यागिक क्रांति' शब्द 'अनुपयुक्त' समझा गया। इंग्लैंड में परिवर्तन क्षेत्रीय तरीके से हुआ प्रमुख रूप से लंदन, मैनचेस्टर, बर्मिंघम (Birmingham) या न्यूकासल (Newcastle) नगरों के चारों ओर न कि संपूर्ण देश में।


क्या कपास या लोहा उद्योगों में अथवा विदेशी व्यापार में 1780 के दशक से 1820 के दशक तक हुए विकास या संवृद्धि को क्रांतिकारी कहा जा सकता है? नवी मशीनों के कारण सूती कपड़ा उद्योग में जो ध्यानाकर्षणकारी सवृद्धि हुई वह भी एक ऐसे कच्चे माल (कपास) आधारित थी जो ब्रिटेन के  बाहर से मँगाया जाता था और तैयार माल भी दूसरे देशों में (विशेषतः भारत में ) बेचा जाता था। धातु से बनी मशीनें और भाप की शक्ति तो उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक दुर्लभ रहीं। ब्रिटेन के आयात और निर्यात में 1780 के दशक से जो तेजी से वृद्धि हुई उसका कारण यह था कि अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम के कारण उत्तरी अमरीका के साथ जो व्यापार बाधित हो गया था वह फिर से शुरू हो गया। इस वृद्धि को तीव्र कहकर अंकित किया गया क्योंकि जिस बिन्दु से उसका प्रारंभ हुआ था वह काफी नीचे था।


आर्थिक परिवर्तनों के सूचकांक यह दर्शाते हैं कि सतत् औद्योगीकरण 1815-20 से पहले को बजाय बाद में दिखाई दिया था। 1793 के बाद के दशकों में फ्रांसीसी क्रांति और नेपोलियन के युद्धों के विघटनकारी प्रभावों का अनुभव किया गया था। औद्योगीकरण को देश के धन के पूँजी निर्माण में या आधारभूत ढाँचा तैयार करने में अथवा नयी नयी मशीने लगाने के लिए अधिकाधिक निवेश करने में इन सुविधाओं के कुशलतापूर्ण उपयोग के स्तरों को बढ़ाने और उत्पादकता में वृद्धि करने के साथ जोड़ा जाता है। यानि लाभदायक निवेश इन मायनों में उत्पादकता के स्तरों के साथ-साथ 1820 के बाद धीरे-धीरे बढ़ने लगा। 1840 के दशक तक कपास, लोहा और इंजीनियरिंग उद्योगों से आधे से भी कम औद्योगिक उत्पादन होता था तकनीकी प्रगति इन्हीं शाखाओं तक ही सीमित नहीं थी बल्कि वह कृषि संसाधन तथा मिट्टी के बर्तन बनाने (पौटरी) जैसे अन्य उद्योग धंधों में भी देखी जा सकती थी।

ब्रिटेन में औद्योगिक विकास 1815 से पहले की अपेक्षा उसके बाद अधिक तेजी से क्यों हुआ? इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ने के लिए इतिहासकारों ने इस तथ्य की ओर इशारा किया है कि 1760 के दशक से 1815 तक ब्रिटेन ने एक साथ दो काम करने की कोशिश की पहला औद्योगिकरण और दूसरा यूरोप, उत्तरी अमरीका और भारत में युद्ध लड़ना; और शायद वह उनमें से एक काम में असफल रहा। ब्रिटेन 1760 के बाद अगले 60 वर्षों में से 36 वर्ष तक लड़ाई में व्यस्त रहा। जो पूंजी निवेश के लिए उधार ली गई थी वह युद्ध लड़ने में खर्च की गई। यहाँ तक कि युद्ध का 35 प्रतिशत तक खर्च लोगों की आमदनियों पर कर लगाकर पूरा किया जाता था। कामगारों और श्रमिकों को कारखानों तथा खेतों में से निकालकर सेना में भर्ती कर दिया जाता था। खाद्य सामग्रियों की कीमतें तो इतनी तेजी से बढ़ीं कि गरीबों के पास अपनी उपभोक्ता सामग्री खरीदने के लिए भी बहुत कम पैसा बचता था। नेपोलियन की नाकाबंदी की नीति और ब्रिटेन द्वारा उसे नाकाम करने की कोशिशों ने यूरोप महाद्वीप को व्यापारिक दृष्टि से अवरुद्ध कर दिया। इससे ब्रिटेन से निर्यात होने वाले अधिकांश लक्ष्यस्थल ब्रिटेन के व्यापारियों की पहुँच बाहर हो गए।

'क्रांति' के साथ प्रयुक्त 'औद्योगिक' शब्द अर्थ की दृष्टि से बहुत सीमित है। इस दौरान जो रूपांतरण हुआ वह आर्थिक तथा औद्योगिक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उसका विस्तार इन क्षेत्रों से परे तथा समाज के भीतर भी हुआ और इसके फलस्वरूप दो वर्गों को प्रधानता मिली पहला था बुर्जुआ वर्ग यानी मध्यम वर्ग और दूसरा था नगरों और देहाती इलाकों में रहने वाला मजदूरों का सर्वहारा वर्ग।


1851 में लंदन में विशेष रूप से निर्मित स्फटिक प्रासाद (क्रिस्टल पैलेस) में ब्रिटिश उद्योग की उपलब्धियों को दर्शाने के लिए एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसे देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। उस समय देश की आधी जनसंख्या शहरों में रहती थी, लेकिन शहरों में रहने वाले कामगारों में से जितने लोग हस्तशिल्प की इकाइयों में काम करते थे, लगभग उतने ही फैक्ट्रियों या कारखानों में कार्यरत थे। 1850 के दशक से, शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों का अनुपात अचानक बढ़ गया और उनमें से अधिकांश लोग उद्योगों में काम करते थे, यानी वे श्रमजीवी वर्ग के थे। अब ब्रिटेन के समूचे कार्य बल केवल 20 प्रतिशत भाग ही देहाती इलाकों में रहता था। औद्योगीकरण की यह रफ्तार अन्य यूरोपीय देशों में हो रहे औद्योगीकरण के मुकाबले बहुत ज्यादा तेज थी। ब्रिटिश उद्योग के विस्तृत अध्ययन में इतिहासकार ए.ई. मस्सन ने कहा है कि " 1850 से 1914 तक की अवधि को एक ऐसा काल मानने के लिए पर्याप्त आधार हैं जिसमें औद्योगिक क्रांति वास्तव में अत्यंत व्यापक पैमाने पर हुई, जिससे संपूर्ण अर्थव्यवस्था और समाज की कायापलट, अन्य किसी भी परिवर्तन के मुकाबले बड़ी तेजी से और व्यापक रूप से हुआ था। "

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