E-gyankosh Android application

भारत की विदेश नीति के सिद्धांत

भारत की विदेश नीति के सिद्धांत

 भारत की विदेश नीति के सिद्धांत 

भारत विश्व गुरु बनने की राह में है, यह एक शांतिप्रिय देश है जिसका उद्देश विश्व भर में शांति के साथ मैत्रीय संबंध स्थापित करना है। भारत की विदेश नीति  को समझने के लिए कुछ मूलभूत सिद्धांत है जिनकी व्यख्या नीचे दी गई है। 

i) भारत बहुत दिनों तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहा, अतः इसने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही उपनिवेशवाद विरोधी नीति का अनुगमन किया विश्व के मानचित्र पर भारत के एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में उभरने के साथ ही एशिया अफ्रीका लातिनी अमरीका के देशों में उपनिवेशों के स्वतंत्र होने का सिलसिला शुरू हुआ। भारत की आज़ादी के बाद श्रीलंका, बर्मा और इंडोनेशिया आज़ाद हुए। इसके बाद भारत ने विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ बोलकर अफ्रीकी देशों की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ii) भारतीय विदेश नीति अपने आप में स्वतंत्र है, भारत दो बड़ी शक्तियों में से किसी के गुट में शामिल नहीं है। पर ऐसा मानना सही नहीं कि भारत की विदेश नीति "तटस्थ" है। वस्तुतः अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर भारत कभी "तटस्थ" नहीं रहा बल्कि इसके गुण और दोष के आधार पर विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से अपनी सम्मति स्पष्ट रूप से जाहिर करता रहा है। भारत की इस नीति से कुछ बड़ी शक्तियां खुश नहीं थीं लेकिन तीसरे विश्व के कई देशों ने भारत की इस नीति की प्रशंसा की।

iii) भारत कभी भी द्विपक्षीय या बहुपक्षीय सैन्य संधि के पक्ष में नहीं रहा है। विश्व की समस्याओं को सुलझाने में सैन्य शक्ति की भूमिका का भारत ने हमेशा विरोध किया है। शीत युद्ध शुरू होने के बाद अमरीका और सोवियत संघ में अस्त्र बढ़ाने की होड़ लग गयी। नये-नये आण्विक अस्त्र तैयार हुए और नयी नयी सैन्य संधियाँ कायम की गयीं। भारत का विचार था कि ऐसा करने से देशों के बीच तनाव बढ़ेगा और इसकी परिणति सशस्त्र संघर्ष में होगी। अतः भारत ने शांति कायम करने की दृष्टि से अपने को हर तरह के गुटों से अलग रखा।

iv) भारत ने सभी देशों से मित्रता बनाये रखने की कोशिश की। खास बात यह है कि भारत ने अमरीकी गुट (पूँजीवादी व्यवस्था) और सोवियत गुट (साम्यवादी व्यवस्था ) के देशों से बिना किसी भेदभाव के मित्रता की भारत ने कभी भी एक देश को दूसरे देश से लड़ाने की नीति पर अमल नहीं किया। भारत में सरकार का ढाँचा लोकतांत्रिक है। लेकिन विदेश नीति के मामले में भारत न पश्चिमी लोकतांत्रिक देशो से अधिक जुड़ा और न ही साम्यवादी देशों से इस कारण दूर हुआ।

v) भारत ने अपनी विदेश नीति के तहत नस्लवाद विरोधी नारा बुलंद किया। जिसकी शुरूवात गांधी जी ने 19वीं शताब्दी के आरंभ में दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष कर की थी। लेकिन मानव सभ्यता के लिए यह शर्मनाक बात है कि नस्लवाद अपने क्रूर रूप में आज भी दक्षिण अफ्रीका में मौजूद है। यह नस्लवाद विश्व मत और सभ्यता के सभी सिद्धांतों को नकारता हुआ आज भी वर्तमान है। भारत ने सबसे पहले 1946 में संयुक्त राष्ट्र संघ में यह मुद्दा उठाया था। उसके बाद आज तक भारत विश्वव्यापी नस्लवाद विरोधी आंदोलन में सक्रिय हिस्सा ले रहा है।

vi) भारत इस विचार का समर्थक रहा है कि अस्त्रों की होड़ और सैन्य संधियों को रोके बिना विश्व शांति कायम करना असंभव है। भारत निरस्त्रीकरण को विश्वशांति की कुंजी मानता है। इसके अतिरिक्त निरस्त्रीकरण से अस्त्रों पर खर्च की जाने वाली विशाल राशि की बचत होगी और इस राशि का उपयोग गरीब देशों के विकास के लिए किया जा सकता है।

0 Response to "भारत की विदेश नीति के सिद्धांत"

एक टिप्पणी भेजें

if you have any doubt or suggestions please let me know.

Advertise in articles 1

advertising articles 2