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 क्रिप्स मिशन

क्रिप्स मिशन

 क्रिप्स मिशन 

द्वितीय विश्वयुद्ध में जब ब्रिटिश शासन जापान के विरुद्ध युद्ध लड़ रहा था तो उसने यह घोषणा कर दी कि भारत भी युद्ध में शामिल हो गया है परन्तु तत्कालीन परिस्थतियां इसके उलट थी महात्मा गांधी ने युद्ध में भाग लेने से मना कर दिया और इसी से नीव पड़ी क्रिप्स मिशन मिशन की। स्टेफोर्ड क्रिप्स की अध्यक्षता में एक कमेटी बनायी गई जिसका उद्देश्य भारत की राजनीतिक पार्टियों के साथ समझौता कर उनको युद्ध में ब्रिटिश राज के साथ उतारना था तथा ब्रिटिश शासन के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाना था।

क्रिप्स मिशन की नींव तथा इतिहास

जापान के पूर्व की ओर बढ़ते आक्रामक कदम को न रोक पाने के कारण लोगों में ब्रिटिश सेना की क्षमता पर अविश्वास बढने लगा, साथ ही व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान युद्ध प्रयासों के खिलाफ व्यक्तिगत चुनौतियों ने यह प्रमाणित कर दिया कि भारत का राजनीतिक वातावरण अब निश्चित ही युद्धकारी होने वाला था। इलाहाबाद के प्रमुख वकील सर तेज बहादुर सप्पू द्वारा कांग्रेस और लीग के मौजूदा गतिरोध को सुलझाने के लिए एक प्रयास किया गया। उस अधिवेशन में जहां यह प्रयास असफल हुआ, बॉम्बे अधिवेशन के नाम से जाने जाना वाला यह सरकार के साथ इस नतीजे पर खत्म हुआ कि इसमें भारतीय परिप्रेक्ष्य को शामिल करना होगा। यह अधिवेषन 13-14 मार्च, 1941 को बॉम्बे में आयोजित किया गया। इस अधिवेषन में बड़े स्तर पर उन गैर कांग्रेसियों ने भाग लिया जो कि 1931 में लंदन के गोलमेज सम्मेलन का हिस्सा बने थे। इस अधिवेषन में यह प्रस्तावित किया गया कि ब्रिटेन युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेट का दर्जा दे दूसरा, इस बीच सभी केंद्रीय सरकारी पद गैर अधिकारी भारतीयों को सौंप दिये जाने चाहिए। इस प्रकार से प्रस्ताव कांग्रेस के उन प्रस्तावों से अलग थे क्योंकि इसमें तुरंत स्वशासन की मांग नहीं की गई थी और इन्होंने यह भी प्रस्तावित किया कि भारत में केंद्रीय कार्यकारी परिषद कम से कम युद्ध के दौरान क्राउन के प्रति जवाबदेह बनी रहेगी। इन प्रस्तावों ने नई उम्मीदों को जागृत किया। तथापि सरकार के साथ बातचीत अंततः असफल रही। सरकार ने प्रस्तावों की किसी भी मांग को मानने से इंकार कर दिया। राज्य सचिव अमेरी ने युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेटस के मुद्दे पर साम्प्रदायिक पत्ते खेले उसने यह गौर किया कि जिन्ना ने प्रस्तावों की 'कांग्रेस कुचक्र' कहकर निंदा कर रही थी।

इसी बीच भारतीय राजनीति में सरकार की तरफ से अल्पसंख्यकों को लुभाने का प्रयास जारी रहा। यह तब तक जारी रहा जब तक कि मुस्लिम लीग ने यह माँग नहीं की कि अगर कांग्रेस पूरी तरह से केंद्र पर नियंत्रण करती है तो उसे भारतीय राज्य से अलग हिस्सा चाहिए। इस समय ब्रिटेन निष्क्रिय रहने का कोई जोखिम नहीं ले सकता था। ब्रिटेन के युद्ध मंत्रिमंडल ने भारत के डोमिनियन स्टेटस के लिए कुछ निश्चित पैमाने तय किये। युद्ध मंत्रिमंडल ने अपनी सभा में यह घोषणा की कि यहाँ उद्देश्य एक नए संघ के निर्माण का है जो एक डोमिनियन का गठन करेगा तथा यह यू.के. के साथ जुड़ा रहेगा एवं अन्य डोमिनियन संयुक्त रूप से क्राउन के प्रति निष्ठा रखेंगे, लेकिन हर तरह से समान होंगे और आंतरिक एवं विदेषी मामलों के हर पहलू में कोई भी किसी भी तरह अधीनस्थ नहीं होगा । इस प्रकार ब्रिटेन के समर्थन में बाधा डालने वाले सभी उपायों को विफल करने के लिए क्रिप्स मिशन 30 मार्च 1942 को सर स्टेफोर्ड क्रिप्स की अध्यक्षता में बनाया गया। 

क्रिप्स मिशन का आधार तथा चुनौतियां

क्रिप्स मिशन अपने प्रस्ताव में खामियों से भरा था। स्टेफोर्ड क्रिप्स, ब्रिटिश राजनीति का एक समाजवादी था जो कि भारतीय राष्ट्रवादियों की परिहार्य मांगों को स्वीकार करने को तैयार था। उदाहरण के लिए 28 मार्च 1942 को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उसने कहा कि भविष्य में भारतीय राज्य को राष्ट्रमंडल से अलग होने का अधिकार है। राजगोपालाचारी और नेहरू जैसे नेताओं के साथ चर्चा के दौरान उसने यह जाना कि कांग्रेस का विरोध इसलिए है कि भारत की युद्धोत्तर राजनीतिक स्थिति में राष्ट्रवादियों की पूर्ण स्वराज या पूर्ण आजादी की माँग के बनिस्बत 'डोमिनियन स्टेटस को थोपने की कोशिश की जा रही है। उसने यह स्पष्ट किया कि इस प्रस्ताव द्वारा हाउस ऑफ कॉमंस या खुद डोमिनियस में उठने वाली आपत्तियों को शांत किया जा सकता है। क्रिप्स ने यह स्पष्ट किया कि यह सिर्फ शब्दावली का फर्क है न कि उसके अर्थ का। तथापि चर्चिल उतना अधिक उदार और स्वीकारोक्ति देने वाला नहीं था। उसने इस विचार को सतत रूप से बनाए रखा कि भारत में भविष्य से संबन्धित समस्या ब्रिटिश औपनिवेषिकरण नहीं बल्कि मुस्लिमों की आकाक्षाएँ, रियासतें और हिन्दू अस्पृष्य हैं। भारत को स्वतन्त्रता न देने के पीछे भारत में कई सम्प्रदाय और कई राष्ट्र' वाली मौजूदा औपनिवेषिक रणनीति फिर से कार्य कर रही थी।इस प्रकार की रूढ़िवादिता के चलते स्टेफोर्ड क्रिप्स कुछ खास नहीं कर पाए। इससे भी अधिक युद्ध में ब्रिटेन के जीत के कोई आसार नहीं दिख रहे थे। 15 फरवरी को सिंगापुर ने समर्पण कर दिया और 8 मार्च 1942 को रंगून ने जापान के आगे घुटने टेक दिये यह क्रिप्स मिशन की घोषणा के ठीक एक दिन पहले हुआ (9 मार्च 1942 )। द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की जीत के ठंडे पड़ जाने पर गाँधी ने क्रिप्स मिशन को एक डूबते बैंक की भविष्य की तारीख के चेक की संज्ञा दी। इससे यह अंदाजा लग गया कि तात्कालिक स्थितियों में ब्रिटेन के पास अब देने को बहुत थोड़ा बचा है।

क्रिप्स मिशन के परिणाम

क्रिप्स मिशन की बातचीत की असफलता ने ब्रिटेन के राजनीतिक गलियारों के धर्म को जरा सा भी विचलित नहीं किया। भारत में राष्ट्रीय सरकार की मांग जापान की दक्षिण-पूर्वी एशिया में हुई जीतों के सिलसिले के साथ असफल होती गई। क्रिप्स और क्लेमेंट एटली की तरह ब्रिटिश लेबर पार्टी के नेता और विंस्टन चर्चिल के समय रहे उप प्रधानमंत्री जैसे कई लोगो ने क्रिप्स मिशन पर बातचीत के असफल होने का जिम्मेदार महात्मा गाँधी को ठहराया। यह उस परिस्थिति का एक अनुचित मूल्यांकन था। बल्कि ब्रिटेन के मंत्रालय, लिनलिथगो और ब्रिटिश भारतीय सेना के कमांडर प्रमुख वेवेल ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि क्रिप्स कांग्रेस को कुछ ज्यादा ही छूट और स्वीकारोक्ति दे रहे हैं और इस तरह यह मिशन के पूर्ण रूप से असफल होने का कारण बना। क्रिप्स मिषन की घोषणा के पाँच महीने बाद 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने अपने बॉम्बे अधिवेषन में भारत छोड़ो का प्रस्ताव पारित किया और इस तरह एक आंदोलन शुरू हुआ जिसने अपने व्यापक प्रसार, लोकप्रिय भागीदारी के आधार पर इससे पहले के सभी गाँधीवादी आन्दोलनों को पीछे छोड़ दिया।

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